Encyclopedia Of Jainism

वीर निर्वाण संवत् सबसे प्राचीन!

blog 22

विभिन्न धर्मों में अपने महापुरुषों के नाम से संवत् चलाने की परम्परा रही है। जैनधर्म में भी भगवान् महावीर की निर्वाण तिथि के आधार पर वीर निर्वाण संवत् का प्रचलन है। यह हिजरी, विक्रम, ईसवी, शक आदि सभी संवतों से अधिक  पुराना है एवं जैनधर्म की प्राचीनता व अपने मान्यता का उद्घोषक है । इस बात का प्रमाण आमेर म्यूजियम में रखे शिलालेख से मिलता है। इसके साथ ही भारतीय साहित्य के ग्रंथ भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं ।

 
  1.  वीर निर्वाण संवत् — भगवान् महावीर के निर्वाण होने से अगले दिन ही कार्तिक सुदी १ से प्रारम्भ हुआ ।
  2. विक्रम संवत् — यह संवत् राजा विक्रम से सम्बन्धित है एवं महावीर निर्वाण के ४७० वर्ष बाद प्रारम्भ हुआ ।
  3. शक संवत् — यह संवत् आज प्रचलन में नहीं है किन्तु इतिहास बताता है कि यह कभी दक्षिण देश में प्रचलित था। यह संवत् भृत्यवंशी गौतमी पुत्र राजा सातकर्णी शालीवाहन ने शुरू किया था। जो कि भगवान् महावीर के निर्वाण के ६०५ वर्ष पश्चात् शुरू हुआ ।
  4. शालिवाहन संवत् — यह संवत् भी वर्तमान में प्रचलन में नहीं है जबकि दक्षिण देश में किसी समय प्रचलन में था। यह भगवान् महावीर निर्वाण के ७४१ वर्ष पश्चात् प्रारम्भ हुआ ।
  5. ईसवी संवत् — यह संवत् ईसामसीह के स्वर्गवास पश्चात् यूरोप में प्रचलित हुआ । यह अंग्रेजी साम्राज्य के मध्य सारी दुनिया में फैला और भगवान् महावीर निर्वाण के ७२५ वर्ष पश्चात् प्रारम्भ हुआ ।
  6. गुप्त संवत — इस संवत् की स्थापना गुप्त साम्राज्य के प्रथम सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपने राज्यषिभेक के समय की। भगवान् महावीर निर्वाण के ८४६ वर्ष पश्चात् प्रारम्भ हुआ ।
  7. हिजरी संवत — यह संवत् पैगम्बर मोहम्मद साहब के मक्का से मदीना जाने के समय से उनकी हिजरत में वीर निर्वाण के ११२० वर्ष पश्चात् स्थापित हुआ। इसी को मुहर्रम या शवान सन् भी कहते हैं ।
  8. मघा संवत — यह संवत् भगवान् महावीर निर्वाण के १००३ वर्ष पश्चात् प्रारम्भ हुआ है। इस संवत्सर का प्रयोग कहीं भी देखने में नहीं आता। मात्र महापुराण ७६—३९९ से सिद्ध होता है । ऐतिहासिक राजकीय भारतीय संवत् के सर्वप्रथम प्रवर्तक राजा विक्रमादित्य थे। आप अनेक भारतीय लोककथाओं के नायक है । अयोध्या के राजा के बाद उज्जैन के राज विक्रमादित्य ने इस देश की परम्परा में जैसा गहरा स्थान बनाया है। वैसा दूसरा कोई राजा कभी नहीं बना सका । राजा विक्रमादित्य तीव्र बुद्धिमान, पराक्रमी, उदार, दानशील, धर्मसहिष्णु, विद्यारसिक, विद्वानों के प्रश्रयदाता, न्यायपरायण, धर्मात्मा, प्रजावत्सल एवं सुशासक के रूप में आदर्श भारतीय नरेश माने जाते हैं । पूर्ववर्ती चन्द्रगुप्त मौर्य एवं खारवेल जैसे महान् जैन सम्राटों की परम्परा में देश को विदेशियों के आक्रमण से मुक्त करने में यह महान् जैन सम्राट विक्रमादित्य भी अविस्मरणीय है। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार जैनधर्म का परमभक्त था। कुलधर्म और राजधर्म भी जैनधर्म था । विक्रमादित्य ने चिरकाल तक राज्य किया और स्वदेश को सुखी, समृद्ध एवं नैतिक बनाया । विक्रमादित्य ने चिरकाल तक राज्य किया और स्वदेश को सुखी, समृद्ध एवं नैतिक बनाया । विक्रमादित्य तथा उसके उपरान्त उसके वंशजों ने मालवा पर लगभग १०० वर्ष राज्य किया था । विक्रमादित्य जैसे राजा के आदर्शों का स्मरण हम लोग चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन यानि युग प्रतिपदा को राष्ट्रीय नववर्ष दिवस के रूप में मनाते हैं । 

श्रुत संवर्धिनी पत्रिका – अगस्त २०११ से )