१०८ फुट उत्तुंग भगवान ऋषभदेव मूर्ति निर्माण स्थली मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र

मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र ९९ करोड़ महामुनियों की निर्वाणस्थली के रूप में विश्व प्रसिद्ध है, जिसे दक्षिण के लघु सम्मेदशिखर पर्वत के रूप में भी जैन समाज में मान्यता प्राप्त है। यह तीर्थ ९ लाख वर्ष पूर्व भगवान मुनिसुव्रतनाथ के तीर्थ काल से पूज्यता को प्राप्त है क्योंकि भगवान राम, हनुमान, सुग्रीव, सुडील, गव, गवाक्ष, नील, महानील आदि ९९ करोड़ महामुनियों ने जैनेश्वरी दीक्षा धारण करके दक्षिण भारत के इस पर्वत से कठोर तपश्चरण के साथ मोक्षधाम प्राप्त किया था। अत: तभी से सिद्धक्षेत्र के रूप में आज तक मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र की महिमा जन-जन के द्वारा गाई जाती है। इस पर्वतराज पर २ चूलिकाएँ हैं, जिनमें एक मांगीगिरि और दूसरी तुंगीगिरि के नाम से प्रसिद्ध है। इस पर्वत पर हजारों वर्ष प्राचीन जिनप्रतिमाएँ, यक्ष-यक्षणियों की मूर्तियाँ, शुद्ध-बुद्ध मुनिराज के नाम से दो गुफाओं में भगवान मुनिसुव्रतनाथ एवं भगवान नेमिनाथ की प्रतिमाएँ आदि विराजमान हैं। साथ ही तलहटी में भी भगवान पाश्र्वनाथ जिनमंदिर, मूलनायक भगवान आदिनाथ जिनमंदिर, भगवान मुनिसुव्रतनाथ जिनमंदिर, मानस्तंभ आदि निर्मित हैं।

विशेषरूप से मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र के साथ पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का अभिन्न नाता जुड़ा हुआ है। सर्वप्रथम सन् १९९६ में १९ मई से २३ मई तक इस तीर्थ पर भगवान मुनिसुव्रतनाथ की २१ फुट उत्तुंग काले पाषाण की खड्गासन प्रतिमा का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव अत्यन्त ऐतिहासिक रूप में पूज्य माताजी के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ। इतिहास के अनुसार सन् १९४० में चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज एवं आचार्यकल्प मुनि श्री वीरसागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में यहाँ मानस्तंभ की विशाल पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई थी पश्चात् इस दीर्घ अवधि के उपरांत पूज्य माताजी के सान्निध्य में सन् १९९६ में यहाँ उपरोक्त ऐतिहासिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। इस प्रतिष्ठा महोत्सव में ६-६ फुट की २४ तीर्थंकर भगवन्तों की प्रतिमाएँ भी मंदिर प्रांगण में विराजमान की गईं । विशेषरूप से इस सिद्धभूमि पर तलहटी में पूज्य माताजी की प्रेरणा से सहस्रकूट जिनमंदिर का निर्माण भी किया गया है, जिसमें सुन्दर बने कमल पर चारों ओर अष्टधातुमय १००८ जिनप्रतिमाएंं विराजमान हैंं।

इसी के साथ सन् १९९६ में पूज्य माताजी ससंघ का चातुर्मास मांगीतुंगी जी में हुआ और उन्होंने मांगीतुंगी पर्वत पर अखण्ड पाषाण में भगवान ऋषभदेव की १०८ फुट उत्तुुंग विशालकाय जिनप्रतिमा निर्माण की प्रेरणा प्रदान की। पूज्य माताजी की प्रेरणा के उपरांत समस्त सरकारी कार्यवाही पूर्ण करके ३ मार्च २००२ में पर्वत पर मूर्ति निर्माण हेतु शिलापूजन समारोह का भव्य आयोजन सानंद सम्पन्न हुआ। आज समाज के समक्ष इस मूर्ति निर्माण का कार्य इस चरम लक्ष्य पर आ गया है, जब हमारे समक्ष भगवान का चेहरा निखरकर आ रहा है और २०१५-१६ में ही इस मूर्ति के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का स्वप्न समाज के समक्ष अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भव्य आयोजन के साथ सम्पन्न होगा।

इस प्रकार मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र पर भगवान ऋषभदेव मूर्ति निर्माण आदि समस्त कार्यकलापों में पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के साथ ही पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी का भी सदैव सुन्दर मार्गदर्शन प्राप्त हुआ और पूज्य क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी महाराज (स्व.) एवं पीठाधीश कर्मयोगी स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामी जी के अतुलनीय योगदान से आज मांगीतुंंगी सिद्धक्षेत्र को विश्व के महान तीर्थ के रूप में अद्वितीय स्थान प्राप्त हो रहा है। तीर्थ पर सदैव ही यात्रियों के लिए भोजनशाला, आवासीय धर्मशाला आदि समस्त आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध रहती हैं।