जम्बूद्वीप क्या है

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जम्बूद्वीप क्या है?

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श्रीमते वर्धमानाय, नमो नमित विद्विषे।
यज्ज्ञानान्तरं भूत्वा, त्रैलोक्यं गोष्पदायते।।

भव्यात्माओं!

आज मैं आपको जम्बूद्वीप में ले चलती हूँ। जम्बूद्वीप क्या है? मध्यलोक में सर्वप्रथम द्वीप का नाम जम्बूद्वीप है। हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप की बहुत ही सुन्दर रचना बनी है, जिसे दर्शकगण धरती का स्वर्ग कहते हैं और बहुत ही पुलकित होकर दर्शन करके प्रशंसा करते हुए तृप्त नहीं होते। ऐसे जम्बूद्वीप के बारे में शास्त्रीय आधार से मैं आपको बताती हूँ। जम्बूद्वीप १ लाख योजन विस्तृत थाली के समान गोलाकार है। यह बड़ा योजन है, जिसमें २००० कोस यानि ४००० मील माने गए हैं, अत: यह जम्बूद्वीप ४० करोड़ मील विस्तार वाला है। इसमें बीचों बीच में सुमेरुपर्वत है। यह सुमेरुपर्वत १ लाख योजन ऊँचा है। पृथ्वी में इसकी जड़ १००० योजन मानी गई है और ऊपर ४० योजन की चूलिका है।

जम्बूद्वीप में ६ पर्वत और ७ क्षेत्र हैं

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अब क्रम से मैं आपको बताती हूँ। सबसे पहले जम्बूद्वीप में ६ पर्वत और ७ क्षेत्र हैं। यद्यपि हस्तिनापुर के जम्बूद्वीप में प्रवेश करते समय सबसे पहले विदेह क्षेत्र आता है। विदेह क्षेत्र से होते हुए सभी लोग सुमेरु पर्वत पर चढ़ते हैं लेकिन आप इसे दक्षिण से समझेंगे, तो आपको ज्यादा स्पष्ट समझ में आएगा। जम्बूद्वीप के बाहर चारों तरफ घेर करके लवण समुद्र है। जम्बूद्वीप में दक्षिण से पूर्व पश्चिम समुद्र का स्पर्श करते हुए हिमवन, महाहिमवन, निषध, नील, रुक्मि और शिखरी ये छह पर्वत हैं। हिमवन आदि ६ पर्वतों से जम्बूद्वीप में ७ क्षेत्र हो जाते हैं। सबसे पहले हिमवन पर्वत के दक्षिण में भरत क्षेत्र है। भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत, ऐसे ७ क्षेत्र हैं। तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ में आप सभी पढ़ते हैं कि हिमवन आदि छ: पर्वतों पर क्रम से पद्म, महापद्म, तिगिंच्छ, केशरी, पुण्डरीक, महापुण्डरीक ऐसे छ: सरोवर बने हुए हैं। इन सरोवरों पर बहुत ही सुन्दर कमल खिले हुए हैं। हिमवन पर्वत के पद्मसरोवर में १ लाख ४० हजार से अधिक कमल हैं लेकिन एक मुख्य कमल बहुत सुन्दर और विस्तृत है। उस कमल की कर्णिका पर भवन बने हैं। छ: मुख्य कमल की कर्णिका पर छ: भवनों में श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी ये छ: देवियाँ रहती हैं और मुख्य कमल के चारों तरफ जो कमल खिले हुए हैं, उनमें देवी के परिवार कमल, जो कि मुख्य कमल से आधे-आधे प्रमाण वाले हैं, उनमें भी भवन बने हुए हैं, उनमें परिवार देवियाँ रहती हैं। ये देवियाँ हमेशा भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में जब तीर्थंकर भगवान माता के गर्भ में आते हैं, तब माता की सेवा के लिए आती हैं।

आप पंचकल्याणक में देखते हैं आठ देवियों के बनाने की परम्परा है। उनमें शान्ति और पुष्टि को और जोड़ देते हैं। विदेह क्षेत्र में, ऐरावत क्षेत्र में भी जब तीर्थंकर भगवान माता के गर्भ में आते हैं, तब ये देवियाँ बड़े उत्साह, भक्ति से, आनन्दपूर्वक, इन्द्र की आज्ञा से माता की सेवा के लिए आती हैं। हस्तिनापुर में आप जम्बूद्वीप में देखें, यहाँ ६ पर्वतों पर ६ सरोवर बने हैं, उनमें कमल पर देवियों के छोटे-छोटे भवन बने हैं और उनमें छोटी-छोटी देवियाँ विराजमान हैं। इन ६ सरोवरों से १४ नदियाँ निकलती हैं। जिनके नाम हैं-गंगा, सिंधु, रोहित, रोहितास्या, हरित, हरिकांता, सीता, सीतोदा, नारी, नरकांता, स्वर्णकूला, रूप्यकूला, रक्ता, रक्तोदा। प्रथम और अन्तिम सरोवर से ३-३ नदियाँ निकलती हैं, बाकी ४ सरोवरों से २-२ नदियाँ निकलती हैं। इन १४ नदियों में से भरत क्षेत्र में दो नदियाँ आई हैं गंगा, सिंधु और ऐरावत क्षेत्र में दो नदियाँ गई हैं, रक्ता-रक्तोदा। इनके निमित्त से इन दोनों क्षेत्रों में यानि भरत और ऐरावत क्षेत्र में छ:-छ: खण्ड हो जाते हैं। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-भरतक्षेत्र में बीचों बीच में लम्बा पूर्व और पश्चिम समुद्र को स्पर्श करता हुआ विजयार्ध पर्वत है, जिस पर विद्याधर लोग रहते हैं। विजयार्ध पर्वत के नीचे गुफाएं हैं। चक्रवर्ती जब दिग्विजय के लिए निकलते हैं, तब इन गुफाओं के द्वार को दण्डरत्न से खोलते हैं और छ: महीने तक उसमें से अग्नि जैसी भयंकर ज्वाला निकलती है, जब वह ज्वाला शांत हो जाती है, तब उस गुफा से प्रवेश कर चक्रवर्ती विजयार्ध के दूसरी तरफ उत्तर में जाकर तीनखण्ड को जीतते हैं।

हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप रचना में देखें

हिमवान पर्वत के पद्म सरोवर के पूर्व दिशा में सुन्दर तोरण बना हुआ है। तोरण द्वार से गंगा नदी निकलकर नीचे गिरती है और आगे बढ़ती हुई विजयार्ध पर्वत की गुफा से बाहर आ करके सर्पाकार बहती हुई पूर्व लवण समुद्र में प्रवेशकर जाती है। इसी प्रकार पद्म सरोवर के पश्चिम से सिंधु नदी निकलकर नीचे गिर करके विजयार्ध पर्वत की गुफा से आकर पश्चिम में लवण समुद्र में प्रवेश कर जाती है। इस प्रकार विजयार्ध पर्वत के इधर तीन खण्ड और उधर तीन खण्ड हो जाते हैं। यानि गंगा-सिंधु नदी और विजयार्ध पर्वत के निमित्त से भरतक्षेत्र के छ: खण्ड हो जाते हैं। इनमें से बीच का आर्यखण्ड और बाकी पाँच म्लेच्छ खण्ड कहलाते हैं। आज का उपलब्ध सारा विश्व इसी भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में है। हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में विश्व का नक्शा रखा हुआ है। इस नक्शे में जहाँ भारत लिखा है, वहाँ आप और हम सभी रह रहे हैं। इसी भारत देश में जन्मभूमि अयोध्या नगरी और सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखर ये शाश्वत तीर्थ हैं और बाकी सारे तीर्थ, भगवन्तों की पंचकल्याणक भूमियाँस्वरूप तीर्थक्षेत्र, अतिशयक्षेत्र सभी भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में हैं।

एक विशेष बात यह है कि जहाँ पर गंगा, सिंधु आदि नदियाँ गिरी हैं, वहाँ पर बहुत सुन्दर रचना है। वहाँ एक कुण्ड बना है, कुण्ड में छोटा सा पर्वत है, पर्वत के ऊपर गंगा देवी का भवन बना है, गंगा देवी अपने भवन में रहती है, गंगा देवी के भवन की छत पर खिले हुए कमल पर जटाजूट समेत एक अर्हंत भगवान की प्रतिमा विराजमान है, जहाँ से गंगा नदी नीचे की ओर गिरती है, वहाँ पर गोमुख का आकार बना हुआ है। यह सभी रचना शाश्वत अनादि निधन अकृत्रिम है, कभी कष्ट नहीं होने वाली, रत्नों से निर्मित है। उस गोमुख द्वार से गंगा नदी निकलकर साक्षात् भगवान के मस्तक पर मूसलाधार, मोटी धारा से गिरती हुई, भगवान का अभिषेक करती हुई विजयार्ध पर्वत की गुफा में जाकर दक्षिण द्वार से निकलकर पूर्व समुद्र में प्रवेश कर जाती है। इसी तरह से सिंधु नदी के नीचे रचना बनी हुई है। वहाँ सिंधु देवी का भवन बना हुआ है। इसी पद्म सरोवर से उत्तर तोरणद्वार से रोहितास्या नदी निकल कर हैमवत क्षेत्र में बहती हुई पश्चिम समुद्र में मिल जाती है। महाहिमवन पर्वत के महापद्म सरोवर से रोहित नदी निकलकर हैमवत क्षेत्र में बहती हुई पूर्व समुद्र में मिल जाती है, ऐसे ही आगे नदियों का क्रम है। १४ नदियाँ इस प्रकार से निकलती हैं। विदेह क्षेत्र में सीता-सीतोदा नदी है।

जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र का विस्तार

अब आप देखिए कि जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र कितना बड़ा है? १ लाख योजन में १९० का भाग देने पर ५२६-६/१९ योजन भरतक्षेत्र का प्रमाण आता है। भरतक्षेत्र से हिमवन पर्वत दूना, हिमवन पर्वत से हैमवत क्षेत्र दूना, इससे दूना महाहिमवान पर्वत है, इससे दूना हरिक्षेत्र, उससे दूना निषध पर्वत है। इसके बाद आधी-आधी व्यवस्था होकर हिमवन और शिखरी पर्वत का प्रमाण समान है। भरत, ऐरावत का प्रमाण एक समान है।

सृष्टि की रचना के क्रम में बताया है कि षट्काल परिवर्तन भरत और ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्ड में ही होता है। म्लेच्छ खण्ड में पूरा परिवर्तन नहीं होता और न विजयार्ध पर्वत की श्रेणियों में रहने वाले विद्याधरों में होता है। वहाँ केवल चतुर्थ काल के आदि से अन्त तक का परिवर्तन होता है, ऐसी व्यवस्था बनी है।

हैमवत क्षेत्र, हरिक्षेत्र और बीच में विदेह क्षेत्र है, उसमें दक्षिण में देवकुरु और उत्तर में उत्तरकुरु है और आगे रम्यक् क्षेत्र, हैरण्यवत क्षेत्र, इन छ: क्षेत्रों में भोगभूमि की व्यवस्था है। हैमवत क्षेत्र में जघन्य भोगभूमि, हरिक्षेत्र में मध्यम भोगभूमि, देवकुरु में उत्तम भोगभूमि है। इसी तरह से उत्तरकुरु में उत्तम भोगभूमि, रम्यक क्षेत्र में मध्यम भोगभूमि और हैरण्यवत क्षेत्र में जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था है। ये भोगभूमि की व्यवस्था शाश्वत है, अशाश्वत नहीं है। भरतक्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्ड में प्रथम, द्वितीय, तृतीय काल में भोगभूमि की व्यवस्था रहती है। बाकी तीन काल में कर्मभूमि की व्यवस्था रहती है। जो छ: भोगभूमि शाश्वत बताई हैं, वे अनादिकालीन हैं, अनन्त काल तक रहेंगी, इनमें कभी परिवर्तन नहीं होता। आदि से अंत तक व्यवस्था ज्यों की त्यों बनी रहती है। जैसे-जघन्य भोगभूमि में १ कोस का शरीर, १ पल्य की आयु आदि है।

सुमेरु का ध्यान करें

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अब मैं आपको विदेह क्षेत्र ले चलती हूँ, जहाँ पर बहुत सुन्दर व्यवस्था है। पहले मैं सुमेरु पर्वत का वर्णन करती हूँ, जिसका आप प्रतिदिन सामायिक में ध्यान करें, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ५ मिनट सुमेरु का ध्यान करें। इससे असंख्यातगुणी पाप कर्मों की निर्जरा होगी और असंख्यातगुणा पुण्य का आस्रव होगा, महान पुण्य का बंध होगा और एक न एक दिन आप सभी साक्षात् विदेहक्षेत्र में स्थित अकृत्रिम सुमेरु पर्वत का दर्शन कर लेंगे। अगर आपने हस्तिनापुर में सुमेरु पर्वत का दर्शन किया है, तो उसका ध्यान करें। उसको देखते हुए अकृत्रिम सुमेरु पर्वत का चिन्तन करें। अकृत्रिम सुमेरु पर्वत १० हजार योजन विस्तृत और १ लाख ४० योजन ऊँचा है। १००० योजन की नींव है और ४० योजन की चूलिका है। सबसे नीचे भद्रशाल वन है, इसमें बहुत सुन्दर उद्यान-बगीचा है। नाना प्रकार के सुन्दर वृक्ष फूल लगे हैं। यहाँ एक बात ध्यान में रखना है कि यह सब वृक्ष, फल-फूल वनस्पतिकायिक नहीं हैं प्रत्युत् रत्नों से बने पृथ्वीकायिक है। इस भद्रसाल वन में चारों दिशा में एक-एक विशाल जिनमंदिर है। इनका नाम है त्रिभुवन तिलक जिनमंदिर। उनमें १०८-१०८ जिनप्रतिमाएँ विराजमान हैं। भद्रशाल वन से ५०० योजन ऊपर जाकर नंदनवन है। ५०० योजन अन्दर प्रवेश करके कटनी है। इसमें भी चारों दिशाओं में ४ जिनमंदिर हैं। आगे साढ़े बासठ हजार योजन ऊपर जाकर सौमनस वन है। इसका घटने का क्रम बहुत सुन्दर है, चाहे जैसा ऊबड़-खाबड़ आकार से नहीं घटा है, प्रत्युत् अणु-अणु के क्रम से घटता हुआ बहुत सुन्दर चिकना है। जैसा कि आप हस्तिनापुर में देखें। साढ़े बासठ हजार योजन ऊपर सौमनस वन है, इसकी कटनी भी अंदर ५०० योजन की है। इसमें भी चारों दिशाओं में ४ जिनमंदिर हैं। इसके ऊपर ३६ हजार योजन जाकर पांडुकवन है। धीरे-धीरे क्रम से घटता हुआ है। उसकी भी कटनी ४९४ योजन की है। पाण्डुक वन की चारों दिशाओं में ४ जिनमंदिर हैं। उसके ऊपर ४० योजन की चूलिका है, जो कि नीचे १२ योजन चौड़ी है और ऊपर घटती हुई ४ योजन मात्र रह गई है। ४ योजन भी काफी बड़ा है अत: चूलिका का अग्रभाग ४००० मील से गुणा करने पर १६००० मील का हो जाता है। पाण्डुकवन में चारों विदिशाओं में ४ शिलाएँ हैं। ईशान में पांडुक शिला, आग्नेय में पांडुकम्बला, नैऋत्य में रक्ता और वायव्य में रक्तकम्बला, ऐसी ४ शिलाएँ हैं। पाण्डुकशिला पर भरतक्षेत्र के भगवान का, पाण्डुकम्बला पर पूर्व विदेह के तीर्थंकरों का, रक्ता शिला पर ऐरावत क्षेत्र के तीर्थंकरों का, रक्त कम्बला शिला पर पश्चिम विदेह के तीर्थंकरों का जन्माभिषेक किया जाता है।

भरतक्षेत्र, जिसका विस्तार ५२६-६/१९ योजन बताया है, इसको हम ४००० मील से गुणा करते हैं, तो २१ लाख ५ हजार २६३ मील का क्षेत्र आता है अर्थात् भरतक्षेत्र बहुत विस्तृत है। जैनभारती, जम्बूद्वीप, त्रिलोक भास्कर पुस्तक में मैंने योजन को मील रूप बना-बना करके स्पष्टरूप से विस्तार से दिया है। इस प्रकार सुमेरु में १६ जिनमंदिर हो गए और सभी में १०८-१०८ जिनप्रतिमाएँ हैं। हस्तिनापुर में सुमेरु में १-१ प्रतिमाएँ विराजमान हैं। पाण्डुकवन में चारों शिलाएँ दिखाई हैं। समय-समय पर इन शिलाओं पर भगवान का जन्माभिषेक किया जाता है। अकृत्रिम सुमेरु पर्वत लगभग ६१ हजार योजन ऊँचाई तक बहुत ही सुन्दर, सर्व वर्ण का, पंचवर्णी, रत्नों से निर्मित है। इसके आगे स्वर्णमयी है। इसकी चूलिका वैडूर्यमणि से निर्मित नीलमरत्न के समान चमकती हुई है। ऐसा यह सुमेरु पर्वत, इसकी वंदना, इसका ध्यान समस्त पापों को नष्ट करके महान पुण्य का सम्पादन कराने वाला है। इसका ध्यान कभी न कभी सुमेरु पर्वत पर जन्माभिषेक कराने का सौभाग्य प्राप्त करा सकता है। आप इतनी भावना अवश्य भायें कि हमें अकृत्रिम सुमेरु पर्वत पर अभिषेक करने का और देखने का सौभाग्य प्राप्त हो। जो व्रती हैं, सम्यग्दृष्टि हैं वे नियम से देव पर्याय को प्राप्त करेंगे और वहाँ जाकर सुमेरु पर्वत पर भगवान का जन्माभिषेक करने का, देखने का अवसर अवश्य प्राप्त करेंगे।

सुमेरुपर्वत के वन और पर्वत के नाम

आपने जम्बूद्वीप महामहोत्सव-२००५ में सुमेरु पर्वत की पाण्डुकशिला पर शांतिनाथ भगवान का जन्माभिषेक देखा। सुमेरु पर्वत के नन्दन वन, पाण्डुकवन, सौमनस वन के पूर्व दिशा के भगवन्तों का अभिषेक भी दिखाया गया। लोग बहुत प्रसन्न हुए। आस्था चैनल के माध्यम से लाखों, करोड़ों लोगों ने घर बैठे अभिषेक देखा। केवल भारत में ही नहीं, विदेशों में भी लोगों ने देखा। जगह-जगह से सूचना प्राप्त हुई। लोग प्रशंसा करते हुए तृप्त नहीं हो रहे थे।

अब हम आपको आगे बताते हैं,सुमेरुपर्वत के नीचे भद्रसाल वन की चारों विदिशा में ४ गजदंत पर्वत हैं। जो आगे आकर नील और निषध पर्वत का स्पर्श कर रहे हैं। मूल में इनकी ऊँचाई ४०० योजन की है। इस गजदंत पर्वत पर भी जिनमंदिर हैं और देवभवन भी बने हुए हैं। दो-दो गजदंत पर्वत के बीच में देवकुरु और उत्तरकुरु है। उत्तरकुरु में बहुत ही सुन्दर जम्बूवृक्ष है, जो कि अकृत्रिम अनादिनिधन वनस्पतिकायिक न होकर पृथ्वीकायिक रत्नों से निर्मित है। इसमें जामुन के पत्ते, फूल, फल लगे हुए हैं। इस वृक्ष की उत्तरी शाखा पर एक जिनमंदिर बना हुआ है और ३ शाखाओं पर देवों के भवन हैं, ऐसे ही देवकुरु में बहुत ही सुन्दर शाल्मली वृक्ष है। उसकी दक्षिणी शाखा में जिनमंदिर है और तीन शाखा पर देवों के भवन हैं। इस प्रकार देवकुरु-उत्तरकुरु में जम्बूवृक्ष-शाल्मलि वृक्ष है। हवा के झकोरे से जिनके पत्ते हिलते हैं और फूल सुगंधि युक्त हैं। फल साक्षात् फल के समान है, लेकिन उसे खा नहीं सकते हैं। हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप में धातु से बने हुए जम्बूवृक्ष और शाल्मलि वृक्ष हैं। इसमें भी फल लगे हुए हैं, जिन्हें कई बार बंदर तोड़ लेते हैं।

विदेह क्षेत्र में सीता नदी का स्थान

विदेह क्षेत्र में बीचों बीच में सीता नदी बह रही है। हस्तिनापुर में आप जम्बूद्वीप रचना में ध्यान दें, तो देखेंगे कि सीता नदी के आजू-बाजू में चलने के लिए पगडंडी बनाई गई है। सबसे पहले इसमें दीवाल है, जिसे वेदिका कहते हैं। सीतानदी के उत्तर में ४ वक्षार पर्वत हैं और दक्षिण में ४ वक्षार पर्वत हैं। जिनके नाम हैं क्रमश:-चित्रकूट, नलिनकूट, पद्मवकूट और एक शैलकूट।दक्षिण में त्रिकूट , वैश्रवण, अंजन, आत्मांजन। इन वक्षार पर्वत के बीच में ३ विभंगा नदियाँ हैं। विभंगा नदियों के नाम यथास्थान लिखे हुए हैं। इस प्रकार ४ वक्षार पर्वत और ३ विभंगा नदियों के विभाजन से ८ क्षेत्र बन गए। इन ८ क्षेत्रों के नाम इस प्रकार हैं-कच्छा, सुकच्छा, महाकच्छा, कच्छकावती, आवर्ता, लांगलावर्ता, पुष्कला और पुष्कलावती, ये आठ विदेहक्षेत्र सीता नदी के उत्तर में बने हुए हैं। ये विदेहक्षेत्र भरतक्षेत्र की अपेक्षा चौगुने विस्तार वाले हैं क्योंकि विदेहक्षेत्र तक रचना दूनी-दूनी है। हस्तिनापुर में रचना दूनी-दूनी नहीं ली गई है क्योंकि बनाने में संभव नहीं थी अत: विदेह क्षेत्र छोटे-छोटे दिख रहे हैं। विदेह क्षेत्र में बीचों बीच में विजयार्ध पर्वत है और नील पर्वत की तलहटी में कुण्ड बने हुए हैं। उन कुण्डों के तोरण द्वार से रक्ता, रक्तोदा नदी निकलकर सीता नदी में प्रवेश कर जाती है। अत: प्रत्येक क्षेत्र के भी छ: छ: खण्ड हो जाते हैं। ५ म्लेच्छ खण्ड, १ आर्यखण्ड है। विदेह क्षेत्र में शाश्वत कर्मभूमि रहती है। इस प्रकार से मैंने आपको ८ विदेहक्षेत्र की व्यवस्था बताई है।

जम्बूद्वीप के वर्णन में अब मैं आपको सीतानदी के दक्षिण भाग में ले चलती हूँ। यहाँ पर भी ४ वक्षार पर्वत और ३ विभंगा नदी के निमित्त से ८ विदेह क्षेत्र हो जाते हैं। एक बात बीच में मैं और बता दूँ, जहाँ से हम वक्षार पर्वत को, वत्सा आदि विदेह क्षेत्र को देखते हैं, उसके पहले देवारण्य बने हुए हैं, पश्चिम में भूतारण्य आता है यानि पूर्व विदेह के अंत में जम्बूद्वीप की जगती (वेदिका) के पास सीता नदी के दोनों किनारों पर रमणीय देवारण्य वन स्थित हैं और पश्चिम विदेह के अंत में जम्बूद्वीप की जगती (वेदिका) के पास सीतोदा नदी के दोनों किनारों पर भूतारण्य वन हैं। इन वनों में सुवर्ण, रत्न, चाँदी से निर्मित वेदी, तोरण, ध्वज पताकादिकों से मंडित विशाल प्रासाद हैं। इन प्रासादों में उपपाद शय्या, अभिषेक गृह, क्रीड़नशाला, जिनभवन आदि विद्यमान हैं।

सीतानदी के दक्षिण भाग के आठ विदेह देश के नाम

सीतानदी के दक्षिण भाग में आठ विदेह देश के नाम है- वत्सा, सुवत्सा, महावत्सा, वत्सकावती, रम्या, सुरम्या, रमणीया, मंगलावती। इनमें भी विजयार्ध पर्वत हैं। प्रत्येक विजयार्ध पर्वत के ऊपर आजू-बाजू में दो-दो कटनी हैं। पहली-पहली कटनी पर आभियोग्य जाति के देव रहते हैं। दूसरी-दूसरी कटनियों पर विद्याधर रहते हैं और तीसरी कटनी यानि सबसे ऊपर समतल भाग पर नौ कूट बने हुए हैं। इनमें एक कूट पर जिनमंदिर और ८ कूटों पर देवों के भवन बने हुए हैं। जम्बूद्वीप में सर्वत्र विजयार्ध पर्वत की यही व्यवस्था है। भरत, ऐरावत क्षेत्र में ऐसे ही विजयार्ध पर्वत हैं। विदेह क्षेत्र में विजयार्ध पर्वत के नीचे गुफा से और दक्षिण तरफ निषध पर्वत की तलहटी में जो कुण्ड बने हुए हैं, उन कुण्डों से गंगा-सिंधु नदी निकलकर विजयार्ध पर्वत की गुफा से होते हुए निकलती हैं, तो इस एक-एक विदेह क्षेत्र के छ: छ: खण्ड करती हुई सीता नदी में प्रवेश कर जाती है। सब जगह प्रवेश के स्थान पर रत्नों से निर्मित तोरणद्वार बने हुए हैं। उन तोरणद्वारों के अग्रभाग पर सर्वत्र अकृत्रिम जिनप्रतिमाएँ विराजमान हैं। इन जिनप्रतिमाओं को देवगण, मनुष्य, ऋद्धिधारी महामुनि भी नमस्कार करते हैं।

सुमेरु पर्वत की पश्चिम दिशा में क्या है

इस प्रकार मैंने आपको पूर्व दिशा के १६ विदेह क्षेत्रों के नाम बताए। अब मैं आपको सुमेरु पर्वत के पश्चिम दिशा में ले चलती हूँ। यहाँ पर सीतोदा नदी के दक्षिण भाग में ४ वक्षार पर्वत हैं, उनके नाम हैं-श्रद्धावान, विजटावान, आशीविष और सुखावह। सीतोदा नदी के दक्षिण भाग में ४ वक्षार पर्वत हैं उनके नाम हैं-चन्द्रमाल, सूर्यमाल, देवमाल और नागमाल। इनमें तीन-तीन विभंगा नदियाँ हैं, अत: ४ वक्षार पर्वत और ३ विभंगा नदियों के निमित्त से सीतोदा नदी के दक्षिण में ८ विदेह क्षेत्र हो गए, जिनके नाम हैं क्रमश: पद्मा, सुपद्मा, महापद्मा, पद्मकावती, शंखा, नलिना, कुमुदा और सरित। प्रत्येक क्षेत्र के बीचों बीच में विजयार्ध पर्वत है। निषध पर्वत की तलहटी से गंगा, सिंधु नदी निकल करके सीतोदा नदी में प्रवेश करती हैं जिससे छ:-छ: खण्ड हो जाते हैं। एक आर्यखण्ड और ५ म्लेच्छ खण्ड। इस आर्यखण्ड में हमेशा तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण आदि महापुरुष जन्म लेते रहते हैं, जो कर्मों को नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्षपद को प्राप्त कर लेते हैं।

सीतोदा नदी के उत्तर तट में भी आठ क्षेत्र हो जाते हैं-वप्रा, सुवप्रा, महावप्रा, वप्रकावती, गंधा, सुगंधा, गंधिला, गंधमालिनी। वक्षार पर्वत और विभंगा नदी के निमित्त से होने वाले इन ८ विदेह क्षेत्रों में भी प्रत्येक में बीचों बीच में विजयार्ध पर्वत की गुफाओं से बहती हुई छ: छ: खण्ड करती हुई सीतोदा नदी लवण समुद्र में प्रवेश कर जाती है।

इस प्रकार से पूर्व और पश्चिम विदेह क्षेत्र में ३२ विदेह क्षेत्र हो गए और ३२ विदेह क्षेत्र में छ:-छ: खण्ड हो गए, ३२ आर्यखण्ड हो गए। इन आर्यखण्डों में आज भी तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि विद्यमान हैं। पूर्व विदेह में पुष्कलावती क्षेत्र के आर्यखण्ड में श्री सीमंधर भगवान का समवसरण है, जो कि हस्तिनापुर के जम्बूद्वीप में चतुर्मुखी प्रतिमा के रूप में छोटा सा दिखाया गया है। सीता नदी के दक्षिण में वत्सादेश के आर्यखण्ड में श्री युगमंधर भगवान का समवसरण है।

भगवान के समवसरण

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पश्चिम विदेह में सरित विदेह क्षेत्र में ‘श्रीबाहु’ भगवान का समवसरण है और वप्रा विदेह के आर्यखण्ड में ‘श्रीसुबाहु’ भगवान का समवसरण है। ये ४ समवसरण आज विद्यमान हैं। इन्हें विद्यमान तीर्थंकर या विरहमाण तीर्थंकर कहते हैं। असंख्य देवगण इनकी पूजाभक्ति करते हैं और मुनिगण भी समवसरण में भगवान की भक्ति-वंदना करते हैं। शिलालेखों में उत्कीर्ण लेखों से प्रतीत हुआ है और कुछ ग्रंथों में वर्णन आया है, कुछ टीकाकारों ने भी लिखा है कि आज से २००० वर्ष पूर्व श्री कुन्दकुन्द स्वामी को एक देव उनकी जिनभक्ति से प्रसन्न होकर विमान में बिठाकर विदेह क्षेत्र में ले गया था, वहाँ पर श्री कुन्दकुन्द देव ने सीमंधर भगवान के समवसरण में पहुँचकर भगवान का दर्शन किया। वहाँ पर ५०० धनुष शरीर की अवगाहना है। यहाँ भरतक्षेत्र में भी भगवान श्री आदिनाथ के समय ५०० धनुष की अवगाहना, कोटि पूर्व की आयु आदि थी। विदेह क्षेत्र में श्री कुन्दकुन्द स्वामी को वहाँ के मनुष्य ने हाथ पर रख लिया और प्रश्न किया-हे भगवन्! यह इलायची के बराबर मनुष्य कौन है? तब भगवान ने बताया कि यह भरतक्षेत्र से आए हुए हैं, इनका श्री कुन्दकुन्द नाम है, ये एक महामुनि आचार्य हैं। उस समय से उनका नाम एलाचार्य पड़ गया, ऐसा वर्णन आता है।

श्री कुन्दकुन्द स्वामी द्वारा लिखित ग्रन्थ

श्री कुन्दकुन्द स्वामी ने साक्षात् भगवान के मुख से जो सुना वह अष्टपाहुड़, समयसार आदि ग्रंथों में वर्णित किया है तथा इन्होंने ८४ पाहुड़ लिखे। आज ८४ पाहुड़ तो उपलब्ध नहीं हैं पर इनके द्वारा लिखित समयसार, प्रवचनसार, नियमसार, पंचास्तिकाय, रयणसार और अष्टपाहुड़ आदि ग्रंथ उपलब्ध हैं। इन ग्रंथों में से १०८ गाथा साररूप में छाँटकर मैंने ‘कुन्दकुन्द मणिमाला’ नाम से एक छोटी सी पुस्तक बनाई है। इनके द्वारा लिखित मूलाचार ग्रंथ मुनियों के लिए और ‘रयणसार’ ग्रंथ श्रावकों के लिए बहुत प्रसिद्ध और उपयोगी है। अष्टपाहुड़ ग्रंथ में मुनि और श्रावक सभी के लिए उपयोगी बहुत ही सुन्दर वर्णन आया है। समयसार ग्रंथ तो अध्यात्म शिरोमणि, महासाधुओं के पढ़ने का ग्रंथ है। आज कुछ अव्रतियों ने, कुछ पण्डितों ने, कतिपय विद्वानों ने और कानजी भाई ने इसे पढ़कर निश्चयाभासी बनकर अनर्थ कर डाला। इन्होंने अर्थ का अनर्थ करके शास्त्र को शस्त्र बना दिया, वे निश्चयाभासी बन गए। सोनगढ़ एक पंथ बन गया, जिसे कानजी पंथ कहते हैं। इन लोगों ने मुनियों को नमस्कार नहीं किया। मुनियों को द्रव्यलिंगी, पाखण्डी, ढोंगी कहा। और यहाँ तक कह दिया कि यह सभी मुनि नरक जायेंगे और जो इन मुनियों को आहार देंगे, वे गर्भ में गल-गल कर मरेंगे। यानि गर्भ में ही उनका मरण हो जायेगा......आदि कटु शब्दों का प्रयोग किया। जिन्होंने वर्तमान में किसी पिच्छीधारी को नमस्कार नहीं किया, स्वयं प्रतिमारूप व्रत ग्रहण नहीं किया, प्रतिमाधारी अगर वहाँ जाते हैं, तो वे प्रतिमा छोड़कर अव्रती बन जाते हैं।

समयसार ग्रन्थ अध्यात्म का सर्वोत्तम ग्रन्थ है

मैं बता रही थी कि समयसार ग्रंथ अध्यात्म का सर्वोत्तम ग्रंथ है। इसमें निश्चयपरक एवं व्यवहारपरक गाथाएँ हैं और समन्वयपरक गाथाएँ भी हैं। मैंने एक बार दिल्ली में सन् १९८० में इस ग्रंथ पर एक महीने वाचना रखी, जिसमें पं. श्री कैलाशचंद जी,पं. श्री जगन्मोहनलाल जी, पं. श्री कुंजीलाल जी, पं. श्री पन्नालाल जी साहित्याचार्य आदि अनेक विद्वान पधारे। विद्वानों के सामने जब वाचना हुई, तब मैंने व्यवहारपरक गाथाओं को अलग से उद्धृत किया था, निश्चयपरक गाथाओं को अलग छांटा था, समन्वयपरक गाथाओं को अलग लिया था। यह समयसार एक महान ग्रंथ है। समस्याओं से घिरे, आर्तरौद्र ध्यान से घिरे श्रावक हों या साधु, जिन्हें मानसिक अशान्ति हो, रुग्ण अवस्था हो या सल्लेखना का समय हो, इस समयसार ग्रंथ का अध्यात्म ही काम आता है।

‘‘अहमिक्को खलु शुद्धो, दंसणणाण मइयो सदा रूवी।
णवि अत्थि मज्झ किंचिवि, अण्णं परमाणु मित्तंपि।।’’

अर्थात् मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, ज्ञानदर्शन स्वरूपी हूँ, अमूर्तिक हूँ, अन्य परमाणु मात्र भी मेरा नहीं है। यह अध्यात्म चिन्तन मैंने स्वयं अनुभव किया है। समयसार गंथ की ज्ञानज्योति नाम से हिन्दी टीका, अनुवाद भी मैंने किया है। समयसार का सार भी लिखा है। श्री अमृतचन्द्रसूरि और श्री जयसेनसूरि दोनों आचार्यों की टीका का हिन्दी अनुवाद करके अच्छी तरह से मैंने निश्चय-व्यवहार का समन्वय किया है। उसको पढ़कर आप निश्चित ही निश्चयाभासी नहीं बनेंगे और न व्यवहाराभासी बनेंगे बल्कि दोनों नयों का समन्वय करते हुए अपनी चर्या को आगम के अनुकूल ढाल करके आत्म चिन्तन करेंगे। यह समयसार निश्चयनय की अपेक्षा आत्मा को शुद्ध बता करके, भगवान बता करके ध्यान करने की प्रेरणा देता है और संकट की घड़ी में शरीर से मोह को हटाता है, कम करता है। रुग्ण अवस्था में बहुत ही उपयोगी महान औषधि, महान रसायन है। मेरा स्वयं का अपना अनुभव है और सभी साधुगण इसका अनुभव करते हैं। व्यवहार के अनुसार अपनी चर्या, अपनी क्रिया में सावधान रहना चाहिए और निश्चयनय से अपनी आत्मा का चिंतन करना चाहिए, यही समयसार का सार है।

३२ विदेह क्षेत्रों का वर्णन

मैं आपको ३२ विदेहों के बारे में बता रही थी, जहाँ शाश्वत कर्मभूमि है। वहाँ पर किसी प्रकार का कभी परिवर्तन नहीं होता है। वहॉँ भूकंप, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि अनेक प्रकार के प्राकृतिक प्रकोप नहीं आते हैं। आप सोचेंगे, ऐसे विदेह क्षेत्र में हम जन्म ले लें लेकिन ध्यान रखना सम्यग्दृष्टि नियम से देवायु को ही बांधता है। देवगति में ही जन्म लेता है। अगर बद्धायुष्क यानि पहले उसने नरक की आयु बांध ली फिर सम्यग्दृष्टि बना, तो पहले नरक तक ही जायेगा, नीचे नरक में नहीं और अगर तिर्यंच आयु बांध ली है, तो भोगभूमि का तिर्यंच होगा। इसी तरह अगर पहले मनुष्य आयु बांध ली, फिर सम्यग्दृष्टि बना, तो भोगभूमि का मनुष्य होगा, कर्मभूमि का नहीं। अगर आप विदेह क्षेत्र जाना चाहते हैं, तो सम्यग्दर्शन छोड़कर मिथ्यादृष्टि बनकर जाना होगा लेकिन ऐसी गलती आप कभी नहीं करना क्योंकि सम्यग्दृष्टि होकर आप नियम से, अगर आयु नहीं बांधी है, तो देवायु बाधेंगे, स्वर्ग में देवपद प्राप्त करेगे और वहाँ से विदेह क्षेत्र जाकर सारा नजारा देख सकते हैं। वहाँ केवली भगवन्तों के दर्शन करके, साक्षात् सीमंधर भगवान के समवसरण में दर्शन करके उनकी सारी वाणी सुनकर अपने जीवन को सार्थक करेंगे।

३२ विदेहों में शाश्वत कर्मभूमि है और भरत, ऐरावत क्षेत्र में अशाश्वत कर्मभूमि है। भोगभूमि के बारे में मैंने आपको बताया है कि जघन्य भोगभूमि में १ कोस ऊँचा शरीर और १ पल्य की आयु आदि है और भोगभूमि में १० प्रकार के कल्पवृक्ष हैं। उन कल्पवृक्षों से भोग्य सामग्री मिल जाती है। वहाँ कोई व्यापार, काम धंधा नहीं है। कदाचित्-क्वचित् उनके पुण्य कर्म के उदय से कोई चारण ऋद्धिधारी मुनि पहुँच गए और उन्हें सम्बोधन करके उन्हें सम्यक्त्व ग्रहण करा दे, यह तो संभव है पर वहाँ व्रत संभव नहीं है, कोई व्रती नहीं बन सकते हैं, सम्यग्दृष्टि बन सकते हैं। वहाँ पर किसी को जातिस्मरण से सम्यक्त्व हो जाता है, किसी को गुरुओं के उपदेश से और किसी को आपस में धर्मचर्चा करने से सम्यग्दर्शन हो जाता है। जिनबिंब दर्शन का प्रसंग उन्हें नहीं प्राप्त हो पाता है, क्योंकि उनके न तो कोई ऋद्धि है और न कहीं इधर-उधर जा सकते हैं। भोगभूमि खासकर वही लोग जाते हैं, जो सत्पात्रों को दान देते हैं लेकिन जिनके सम्यक्त्व नहीं है, भद्रजीव हैं, मंदकषायी हैं, जो भव्यात्मा गुरुओं को आहार देते हैं वे विशेष पुण्य करके भोगभूमि में जन्म लेते हैं।

आगे मैं आपको बताती हूँ कि शाश्वत भोगभूमि ६ हैं और शाश्वत कर्मभूमि ३२ हैं। इनके अतिरिक्त जहाँ अशाश्वत कर्मभूमि हैं, जहाँ षट्काल परिवर्तन की व्यवस्था है, वहाँ मैं आपको ले चलती हूँ। भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में जहाँ हम और आप रह रहे हैं, यहाँ शाश्वत तीर्थ अयोध्या है, जो कि अनन्तानन्त तीर्थंकरों की जन्मभूमि हो चुकी है, वर्तमान में यहाँ पर ५ तीर्थंकरों ने जन्म लिया है, श्री ऋषभदेव, श्री अजितनाथ,श्री अभिनंदननाथ, श्री सुमतिनाथ और श्री अनन्तनाथ। बाकी शेष तीर्थंकरों की जन्मभूमि अन्यत्र हो गई, यह हुण्डावसर्पिणी काल का दोष है।

हुण्डावसर्पिणी काल के दोष

मैं आपको हुण्डावसर्पिणी काल के दोष के बारे में और बताती हूँ-असंख्यात उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी बीत जाने के बाद कहीं एक हुण्डावसर्पिणी काल आता है। इसमें सुषमा-दुषमा नामक तृतीय काल की स्थिति में कुछ काल अवशेष रहने पर ही वर्षा आदि पड़ने लगती है। विकलत्रय यानि दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय जीवों की उत्पत्ति होने लगती है। तृृतीय काल के अंत में ही कल्पवृक्षों का अभाव होने लगता है। कर्मभूमि प्रारंभ हो जाती है। तृतीयकाल में १४ कुलकर उत्पन्न हो जाते हैं। प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती भी उत्पन्न हो जाते हैं। इस हुण्डावसर्पिणी काल के दोष से चक्रवर्ती का विजय भंग हो जाता है। जैसा कि आप जानते होंगे कि भगवान बाहुबली, श्री ऋषभदेव के द्वितीय पुत्र, अद्वितीय कामदेव भी थे, इन्होंने भरत चक्रवर्ती के शासन को नहीं स्वीकारा। ६ खण्ड पृथ्वी को जीतने के बाद भी भरत चक्रवर्ती का चक्ररत्न अयोध्या के बाहर ही खड़ा रह गया। लोग भले ही भरत जी को दोष दें, पर भरत जी का इसमें कोई दोष नहीं। वह कर भी क्या सकते थे, कब तक बाहर बैठे रहते, जब तक चक्ररत्न अन्दर प्रवेश नहीं करता, तब तक साम्राज्य पट्ट पर, चक्रवर्ती पद पर उनका अभिषेक नहीं हो सकता था। ३२ हजार मुकुटबद्ध राजा उस समय यह दृश्य देख रहे थे, क्यों चक्ररत्न अयोध्या में प्रवेश नहीं कर रहा है और जब यह ज्ञात हुआ कि उनके भाइयों ने अभी उनकी आधीनता स्वीकार नहीं की है इसलिए चक्ररत्न अन्दर प्रवेश नहीं कर रहा है, तब भरत ने पहले अपने ९९ भाइयों के पास संदेश भेजा। संदेश सुनकर सभी भाई विरक्तमना होकर आपस में बोले, हम चक्रवर्ती के साम्राज्य काल में उनके शासन में नहीं रहेंगे और स्वाभिमानपूर्वक भगवान श्री ऋषभदेव के समवसरण में जाकर दीक्षा ले ली। जब बाहुबली के पास दूत गया, तब बाहुबली भरत जी की आधीनता न स्वीकार कर युद्ध के लिए तैयार हो गए।

मंत्रियों ने जब युद्ध के बारे में सुना, तो उन्होंने आपस में मंत्रणा की कि यह युद्ध व्यक्तियों के विनाश के लिए होगा क्योंकि ये दोनों चरमशरीरी हैं और तद्भव मोक्षगामी है अत: उन्होंने तीन युद्ध-दृष्टि युद्ध, जल युद्ध और मल्ल युद्ध निर्धारित किए। इन तीनों ही युद्ध में भरत जी हार गए क्योंकि भरत के शरीर की ऊँचाई ५०० धनुष थी और बाहुबली की ५२५ धनुष थी। यह हुण्डावसर्पिणी काल का ही दोष है जो कि चक्रवर्ती का विजयभंग हुआ। भरत ने बाहुबली पर चक्र चला दिया। उस समय प्रजा ने उन्हें खूब धिक्कारा, लेकिन चक्रवर्ती करते क्या? कब तक बाहर बैठे रहते। लेकिन यह नियम है कि चक्ररत्न अपने वंशज पर नहीं चलता है अत: वह चक्ररत्न कामदेव बाहुबली की परिक्रमा देकर उनके हाथ में ठहर गया लेकिन बाहुबली चक्रवर्ती तो बन नहीं सकते थे अत: यह सब देखकर बाहुबली को उसी क्षण वैराग्य हो गया, उन्होंने बारह भावनाओं का चिन्तन करते हुए महल में जाकर अपने पुत्र को राज्य दिया और जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर एक वर्ष का योग धारण कर लिया।

भगवान् बाहुबली को शल्य नहीं विकल्प था

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लोग कहते हैं कि बाहुबली जी को शल्य थी, वे एक पैर पर खड़े थे और यह सोच रहे थे कि मैं भरत की भूमि पर खड़ा हूँ, यह बात बिल्कुल गलत है क्योंकि शल्य तीन हैं-मिथ्यात्व शल्य, माया शल्य और निदान शल्य। ये तीनों ही शल्य बाहुबली में नहीं थीं। महापुराण में बताया है कि उन्हें कभी-कभी यह विकल्प आ जाता था कि मेरे द्वारा भरत का अपमान हो गया है, उन्हें क्लेश हो गया, इसी कारण से वे शुक्लध्यान को प्राप्त नहीं कर पाये थे। वे अपने धर्मध्यान में छठे, सातवें गुणस्थान में उतरते-चढ़ते रहे। उनके सभी ऋद्धियाँ प्रगट हो गर्ईं, मन:पर्ययज्ञान हो गया। यह सब भावलिंगी मुनि के ही होता है, द्रव्यलिंगी और शल्य वाले मुनि को ऋद्धि प्रगट नहीं हो सकती है। तत्त्वार्थसूत्र में एक सूत्र आया है-‘नि:शल्योव्रती’ नि:शल्य ही व्रती होता है। फिर बाहुबली तो महाव्रती थे, उनके शल्य नहीं, विकल्प था। एक वर्ष बाद भरत आकर उन्हें नमस्कार करते हैं, उनकी पूजा करते हैं, बस उसी क्षण इनका विकल्प दूर हो जाता है, एक वर्ष का ध्यान पूर्ण हो जाता है और वे एकदम शुक्लध्यान में आरोहण करके केवली बन जाते हैं।

हुण्डावसर्पिणी कालदोष के अन्य प्रभाव

इस प्रकार मैंने आपको बताया कि हुण्डावसर्पिणी काल के दोष के कारण चक्रवर्ती का मानभंग हुआ और चक्रवर्ती के द्वारा ब्राह्मण वर्ण की उत्पत्ति अर्थात् चतुर्थ वर्ण की स्थापना हुई। ३२ विदेह क्षेत्रों में तीन वर्ण ही हैं, ब्राह्मण वर्ण नहीं है। और भी जैसे ३६३ पाखण्ड मत भगवान श्री ऋषभदेव की दीक्षा के समय बन गए। आप जानते होंगे, जब भगवान श्री ऋषभदेव ने प्रयाग में जाकर वटवृक्ष के नीचे जैनेश्वरी दीक्षा ली, उस समय ४००० राजाओं ने भी दीक्षा ले ली थी। भगवान ने तो ६ महीने का योग ले लिया था, पर वे राजागण मुनि अवस्था में भूख-प्यास को अधिक दिन तक झेल नहीं पाए, तो झरने का पानी पीने लगे, वन के फल खाने लगे, तब वनदेवता ने उन्हें मना किया, कि आप इस जिनमुद्रा में अनर्गल प्रवृत्ति नहीं कर सकते। तब उन लोगों ने नाना प्रकार के वेश बना लिए। उसी समय से ३६३ पाखण्ड मत चल गये और न जाने कितने भेद-प्रभेद हो गए, आज तो हजारों-हजारों मत हो गए हैं और भी जैसे हमेशा ६३ शलाकापुरुष होते थे लेकिन इस बार ५८ ही हुए। क्योंकि सोलहवें, सत्तरहवें और अट्ठारहवें तीर्थंकर चक्रवर्ती भी थे। इसके अतिरिक्त नौंवे तीर्थंकर पुष्पदंत से लेकर धर्मनाथ तक सात तीर्थंकर के तीर्थकाल में धर्म का व्युच्छेद हो गया यानि चतुर्विध संघ-मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिका, श्रावक-श्राविका नहीं रहे| ११ रुद्र, कलह प्रिय ९ नारद की उत्पत्ति भी हुण्डावसर्पिणी काल का दोष है। श्री पारसनाथ आदि तीर्थंकरों पर उपसर्ग होना भी काल का दोष है। नाना प्रकार के वेषधारी, कुलिंगी, अनेक प्रकार के चण्डी-मुण्डी के मंदिर बन जाना यह सब भी काल दोष से है। यह बात हमेशा ध्यान रखना कि आज जो द्रव्य मिथ्यात्व दिख रहा है, यह काल दोष से है। भाव मिथ्यात्व तो सब जगह है-स्वर्ग में, नव ग्रैवेयक तक, नरकों में, ३२ विदेहों में, भोगभूमि में सर्वत्र है लेकिन द्रव्य मिथ्यात्व नहीं है।

तीर्थंकरों की जन्म और निर्वाणभूमियां

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एक बात मैं आपको और बताऊँ, जो आज अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकंप, वज्राग्नि, दावानल आदि अग्नि का प्रकोप और अनेक प्रकार के आतंक होते हैं, यह सब भी कालदोष के कारण हैं। काल दोष से ही हस्तिनापुर में तीन तीर्थंकर जन्में, बनारस में दो तीर्थंकर जन्में और तीर्थंकर अन्यत्र जन्में। २४ तीर्थंकरों की १६ जन्मभूमियाँ हो गई हैं। इनमें से कालदोष के कारण ही कुछ अविकसित हैं, कुछ जन्मभूमियों की हालत ऐसी दयनीय हो गई है, जिसे देखकर मन में बहुत कष्ट होता है। तीर्थंकरों की जन्मभूमि के विकास के लिए ही मैंने तीर्थंकर जन्मभूमि विकास समिति भी बनाई है। इस समिति के माध्यम से जन्मभूमि का विकास कार्य चल रहा है। तत्काल में अयोध्या, कुण्डलपुर आदि अनेक तीर्थों का विकास हुआ है। भगवान श्री पुष्पदंतनाथ की जन्मभूमि काकन्दी जो कि अत्यन्त जीर्ण अवस्था में है, जहाँ यात्री न के बराबर जाते हैं, अभी जहाँ मूर्ति चोरी हो गई थी, वहाँ मैंने शिलान्यास करवा कर भक्तों को संकल्प कराया कि आप श्री पुष्पदंतनाथ भगवान की जन्मभूमि का विकास करें। उसका विकास कार्य चल रहा है। काल दोष के कारण ही २४ तीर्थंकरों की ५ निर्वाणभूमि बन गर्इं, जबकि सम्मेदशिखर शाश्वत निर्वाणभूमि है। हमेशा वहीं से सभी तीर्थंकर मोक्ष जाते हैं, लेकिन वर्तमान में २० तीर्थंकर मोक्ष गए हैं। श्री ऋषभदेव, भरत, बाहुबली, कैलाशपर्वत से मोक्ष गए हैं। बारहवें तीर्थंकर श्री वासुपूज्य चम्पापुरी से मोक्ष गए। श्री महावीर स्वामी पावापुरी से, श्री नेमिनाथ भगवान गिरनार पर्वत से मोक्ष गए।

पृथ्वी पर जो भूकंप आदि आते हैं उनमें एक कारण और भी है अत्यर्थ हिंसा। आज कई कत्लखाने बन गए हैं। जब वहाँ से पशुओं की भयंकर चीत्कार उठती है, तो पृथ्वी कांप उठती है। जब अधिक पाप होता है, तो पृथ्वी कांप उठती है इसलिए भूकंप,आदि दुर्घटनाएँ होती हैं।

जम्बूद्वीप के ७८ जिनमंदिर

अब मैं आपको जम्बूद्वीप के ७८ जिनमंदिरों का दर्शन कराऊँगी। मध्यलोक में जम्बूद्वीप से लेकर तेरहवें द्वीप तक ४५८ जिनमंदिर हैं। जम्बूद्वीप में ७८ अकृत्रिम जिनमंदिर हैं, सुमेरु में १६ जिनमंदिर है-४ भद्रसाल वन के, ४ नंदनवन के, ४ सौमनस वन के और ४ पाण्डुक वन के, सब मिलाकर १६ जिनमंदिर हुए। १ जम्बूवृक्ष और १ शाल्मलि वृक्ष को मिलाकर १८ हुए, ४ गजदंत पर्वत के ऐसे २२ हुए, १६ वक्षार पर्वत के जिनमंदिर और ३४ विजयार्ध के और ६ कुलाचल-हिमवन, महाहिमवन, निषध, नील, रुक्मि और शिखरी ये सब मिलाकर ७८ जिनमंदिर जम्बूद्वीप में हैं।

हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप में जो आपको अनेकों जिनमंदिर दिखते हैं, उन्हें आप ध्यान से देखें तो उनमें ७८ जिनमंदिर हैं बाकी देवभवन हैं उन देवभवनों में भी जिनमंदिर हैं। जैसे हिमवन पर्वत पर ११ कूट माने हैं, उन पर एक जिनमंदिर हैं, जिसे सिद्धकूट कहते हैं और बाकी १० कूटों पर देवों के भवन हैं, उन भवनों पर जिनमंदिर दिखाए गए हैं जिन्हें गृह चैत्यालय कहते हैं। महाहिमवन पर्वत पर ८ कूट माने हैं, उनमें १ सिद्धकूट और ७ देवभवन और उन पर जिनमंदिर हैं। निषध पर्वत पर ९ कूट हैं, उनमें १ सिद्धकूट और बाकी देवभवन हैं। ऐसे ही नील, रुक्मी, शिखरी पर्वत पर जिनमंदिर और देवभवन दिखाए गए हैं। हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप में कुल मिलाकर ७८ जिनमंदिर और १२३ देवभवन बने हैं। जम्बूद्वीप के प्रवेश द्वार में एक अनावृत यक्ष का देवभवन बना हुआ है, जिसमें ऊपर जिनप्रतिमा विराजमान हैं। नीचे अनावृत यक्ष-यक्षिणी सहित बैठे हुए हैं। यह जम्बूद्वीप के रक्षक अनावृत यक्ष माने गए हैं और दूसरी तरफ क्षेत्रपाल विराजमान हैं।

इस प्रकार जम्बूद्वीप के ७८ जिनमंदिर और १२३ देवभवनों के ऊपर जिनमंदिर, उनमें जिनप्रतिमाएँ, उन्हें आप नमस्कार करें। यहाँ पर भगवान के ६ समवसरण भी दिखाए गए हैं। विदेहक्षेत्र में श्री सीमंधर, श्री युगमंधर, श्री बाहु और श्री सुबाहु इन ४ तीर्थंकरों के समवसरण और भरतक्षेत्र में भगवान श्री ऋषभदेव का समवसरण, ऐरावत क्षेत्र में श्री बालचंद्र तीर्थंकर का समवसरण दिखाया गया है। यहाँ केवल चतुर्मुखी प्रतिमा दिखाई गई हैं। इन छ: समवसरण में विराजमान भगवन्तों को भक्तिपूर्वक नमस्कार करें।

ऐरावत क्षेत्र में भी षटकाल परिवर्तन

अब आपको यह बात स्पष्ट समझना है कि जैसे भरतक्षेत्र में षट्काल परिवर्तन चल रहा है, उसी प्रकार ऐरावत क्षेत्र में भी षट्काल परिवर्तन हो रहा होगा। ऐरावत क्षेत्र में भी इस समय पंचमकाल होगा, ऐसा मेरा अनुमान है। चूँकि एक कथा आती है, जिसके माध्यम से मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि श्रीकृष्ण के समय द्रौपदी का अपहरण हुआ। अपहरण एक देव ने किया, वह देव द्रौपदी को धातकीखण्ड के भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में ले गया, तो इसका मतलब यह है कि द्रौपदी के शरीर की अवगाहना प्रमाण ही वहाँ का राजा था अत: यह निश्चित है कि धातकी खण्ड के भरत और ऐरावत क्षेत्र में, पुष्करार्ध द्वीप के भरत और ऐरावत क्षेत्र में भी षट्काल परिवर्तन यहाँ के समान ही चलता रहता है। वर्तमान में जैसी स्थिति यहाँ है, वैसी स्थिति वहाँ होना संभव है।

ढाई द्वीप में कर्मभूमियों की संख्या

इस प्रकार से सृष्टि रचना के क्रम में मैंने आपको १७० कर्मभूमि बताई। पूरे ढाई द्वीप में १७० कर्मभूमि हैं, जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र, ऐरावत क्षेत्र और ३२ विदेहक्षेत्र को मिलाकर ३४ कर्मभूमि हैं। ऐसे ही पूर्वधातकी खण्ड में ३४ कर्मभूमि, पश्चिम धातकी खण्ड में ३४, पूर्व पुष्करार्ध द्वीप में ३४, पश्चिम पुष्करार्ध में ३४ सब मिलाकर १७० कर्मभूमि हैं। जिसमें विदेह क्षेत्र की १६० शाश्वत कर्मभूमि हैं। भरत और ऐरावत की १० अशाश्वत कर्मभूमि हैं। जम्बूद्वीप में बाकी भोगभूमि की व्यवस्था है।

इस प्रकार से मैंने जम्बूद्वीप के बारे में आपको बताया। जम्बूद्वीप के दर्शन, वंदन से महान पुण्य का बंध होता है। मैं समझती हूँ-

‘अजानतस्त्वां नमत: फलं यत्, तज्जानतोऽन्यं न तु देवतेति।
हरिन्मणिं काचधिया दधानस्तं तस्य बुद्ध्या वहतो न रिक्त:।।

तीर्थ हस्तिनापुर में जैनेतर बंधु या कोई भी लोग आते हैं पर्यटन की दृष्टि से, मनोरंजन की दृष्टि से आकर घूमते है और यूँ ही हाथ जोड़ लेते हैं या फिर ऐसे ही दर्शन करते हैं तो भी बिना जाने, बिना देखे भी उनको पुण्य का बंध हो जाता है। जैसे मिश्री, शक्कर को बिना रुचि के भी खाने पर या कोई जबरदस्ती खिला दे, तो भी इसका स्वाद मीठा ही आता है, ऐसे ही तीर्थ दर्शन का फल अच्छा ही मिलता है। यह जम्बूद्वीप सदा काल स्थिर रहे और आप सभी इसकी वंदना करके पुण्य का संचय करते रहें, यही मेरा मंगल आशीर्वाद है।



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