तेरहद्वीप मंदिर

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अद्वितीय रचना: तेरहद्वीप जिनालय

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ये मंदिर के बाहर का फोटो है इस मंदिर में जब सुबह अभिषेक होता है तो जो भी अभिषेक भक्त -जन के परिवार वाले करते है सबसे पहले ही उनको अंदर परिक्रमा लगाने का अवसर मिलता है |और यहाँ भी सुबह पंचामृत अभिषेक होता है जो की माता जी की प्रेरणा से रोज 24 भगवान की प्रतिमा का अभिषेक होता है |जब पंचकल्याणक समाप्त हुआ था तो इन्द्रो दवारा एक चमत्कार भी हुआ था | इस मंदिर में देवता ने खुश होकर सोने की गिनी भी सबको बाटी थी | यह एक चमत्कार से कम नहीं था |

जम्बूद्वीप तीर्थ पर अनूठी कृतियों का संगम अद्भुत प्रस्तुति के साथ अति विशिष्ट जिनमंदिरों के रूप में देखा जा सकता है। इन्हीं में एक है-तेरहद्वीप जिनालय। जैन भूगोल के लगभग समग्र स्वरूप को प्रदर्शित करने वाली इस रचना का निर्माण होना पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी का एक दिव्य स्वप्न था, जो 27 अप्रैल से 2 मई 2007 के मध्य 5 दिनों तक आस्था चैनल पर सीधे प्रसारण के साथ सम्पन्न हुए भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सवपूर्वक साकार हुआ। इस रचना में भक्तों को मध्यलोक में स्थित 13 द्वीप के 458 अकृत्रिम जिनमंदिर, पंचमेरु पर्वत, 170 समवसरण, अनेक देवभवन आदि में विराजमान 2127 जिनप्रतिमाओं के दर्शन होते हैं। साथ ही विभिन्न सागर, नदी, पर्वत, भोगभूमि, कल्पवृक्ष आदि की अवस्थिति के संदर्भ में भी जानकारी प्राप्त होती है। यह रचना पूज्य माताजी द्वारा 2200 वर्ष प्राचीन तिलोयपण्णत्ति, त्रिलोकसार आदि ग्रंथों के गहन अध्ययन के आधार पर निर्मित कराई गई है। विश्व में प्रथम बार निर्मित इस अद्भुत रचना के दर्शन करके भक्तजन अपने मनोवांछित फल की प्राप्ति भी करते हैं।

आओ जानें! तेरहद्वीप रचता में क्या -क्या हैं ?

धर्मप्रेमी बंधुओं! हस्तिनापुर की पावन वसुन्धरा पर नवनिर्मित तेरहद्वीप रचना के बारे में आपको जिज्ञासा होगी कि यह क्या हैं? कहॉ हैं? ओंर इसे धरती पर साकार करने का लक्ष्य क्या हैं?

इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको क्रमश: प्राप्त करके तेरहद्वीप की अद्वितीय रचना के दर्शन कर अपूर्व पुण्य संचित करना हें । अब सर्वप्रथम जानिये कि तेरहद्वीप रचना क्या हैं?

यह जैन धर्मं के करणानुयोग ग्रंथो (तिलोकपण्णत्ति त्रिलोकसार आदि) में वर्णित जैनभूगोल की रचना हें | तेरहद्वीप किसी एक द्वीप का नाम नहीँ, वरन् प्रथम ज्ञम्बूद्वीप से लेकर तेरहवें रूचकवर द्वीप तक तेरहद्वीपों की व्यवस्था इस रचना में दर्शाई गई हें । उन तेरहों द्वीपों को अलग - 2 घेर कर एक-एक समुद्र भी रहते हैं अत: तेरह समुद्र भी जानना चाहिए । उन तेरह द्वीप और समुद्रों के नाम इस प्रकार हैं -

संख्या द्वीप समुद्र
1. जम्बूद्वीप लवण समुद्र
2. धातकीखण्डद्वीप कालोदधि समुद्र
3. पुष्करवर द्वीप पुष्करवर समुद्र
4. वारुणीवर द्वीप वारुणीवर समुद्र
5. क्षीरवर द्वीप क्षीरवर समुद्र
6. घृतवर द्वीप घृतवर समुद्र
7. क्षौद्रवर द्वीप क्षौद्रवर समुद्र
8. नंदीश्वर द्वीप नंदीश्वर समुद्र
9. अरुणवर द्वीप अरुणवर समुद्र
10. अरुणाभास द्वीप अरुणाभास समुद्र
11. कुण्डलवर द्वीप कुण्डलवर समुद्र
12. शंखवर द्वीप शंखवर समुद्र
13. रुचकवर द्वीप रुचकवर समुद्र

इन तेरहद्वीपों में विशेष ध्यान देने का विषय यह हें कि ये सभी द्वीप एक दूसरे को घेरकर गोल ओंर चपटे रूप में स्थित हें । इनमें से जो तीसरा पुष्कर द्वीप हें उसमें बीचों बीच में गोलाकार मानुषोत्तर पर्वत है इसलिए यहां तक का क्षेत्र ढाई द्वीप के नाम से जाना जाता है और मानुषोत्तर पर्वत के आगे मनुष्यों का आवागमन बंद है अर्थात् ढाई द्वीपों तक मनुष्य उत्पन्न होते हैं, आगे नहीं | आगे के द्वीपों में मात्र देवता रहते हैं और देवता ही वहाँ आ -जा सकते हैं ।

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दूसरी बात इन ढाई द्वीपों के अन्दर विशेष जानने की यह है कि धातकीखण्ड और पुष्करार्ध इन दोनो द्वीपों में उत्तर-दक्षिण की ओंर दो-दो इष्वाकार पर्वत हैं जिनसे धातकीखण्ड के दो भेद हो जाते हैं पूर्व धातकीखण्ड-पश्चिम धातकीखण्ड । पुष्करार्धद्वीप के भी दो भेद होते हैं-पूर्व पुष्करार्ध -पश्चिम पुष्करार्ध । इस प्रकार ‘जम्बूद्वीप, पूर्व धातकीखण्डद्वीप,पश्चिम धातकीखण्डद्वीप, पूर्व पुष्करार्धद्वीप और पश्चिम पुष्करार्धद्वीप इन पाँच स्थानो की रचना एक समान हें । अर्थात् इन पाँचों द्वीपों में एक-एक मेरु पर्वत हैं । जो कि ढाई द्वीप के पंचमेरु पर्वत कहलाते हैं ।

इस तेरहद्वीप रचना का प्रवेश द्वार उत्तर मुखी हें, इसके अन्दर प्रवेश करते ही शीशे के बहुत बहे दरवाजे से पूरी स्वर्णिम रचना के दर्शन होते हैं और हृदय एकदम गद्गद् हो जाता हें ।

4000 वर्गफुट की गोलाई में इस रचना की स्वर्णमयी छवि देखते ही बनती है | एक बार बड़े दरवाजे के पास से दर्शन करके किसी भी श्रद्धालु का मन तो भरता नहीं है अत: तत्काल वे दरवाजा खोलकर अंदर जाना चाहते हैं, किन्तु इस रचना के अन्दर जा कर दर्शन करने की व्यवस्था नहीं हें इसलिए आप लोगों को उसी व्यवस्थानुसार चलना हैं | अर्थात् यहाँ भक्तिभावपूर्वक दर्शन करके बाहर के प्रदक्षिणा पथ से पूर्व दिशा की ओंर पहुँचें, इस ओंर बने प्लेटफार्म पर चढकर कांच के अन्दर के दृश्य देखें, ऐसा लगता हैं कि साक्षात् स्वर्ग धरती पर उतर आया है | सोने और पंचवर्णी रत्नों के काम वाले बड़े -बड़े पाँचों मेरु पर्वत 16-16 जिनालायों से युक्त हैं उनके ऊपर की चूलिका नीलवर्ण की हें | इन पाँचों मेरू पर्वतों की पांहुक शिलाओं पर 29 अप्रैल 2007 को पंचकल्याणक के मध्य एक साथ ढाई द्वीप के 5 भरत क्षेत्रों के पाँच तीर्थकरों का जन्माभिषेक हुआ, जिसे पूरे देश ने टी.वी.में आस्था चैनल पर देखकर धन्यता का अनुभव किया |

पूर्व दिशा से देखने पर बहुत सारे सोने के मंदिर, रंगीन-रंगीन देवभवनों में भगवान और 80 समवसरणों दर्शन होतें हैं | ये हैं- रुचकवर, कुण्डलवर पर्वतों के पूर्व दिशा सम्बन्धी 1-1 मंदिर, नंदीश्वर द्वीप के 13 मंदिर, मानुषोत्तर पर्वत का एक अकृत्रिम जिनमंदिर एवं पूर्व पुष्करार्ध द्वीप,पूर्व धातकीखण्ड द्वीप और और जम्बूद्वीप की पूर्व दिशा के विदेह क्षेत्रों के जिनमंदिर और देवभवन | यहाँ तेरहों द्वीप के 458 अकृत्रिम मंदिर हैं, वे सोने के कलात्मक काम वाले मंदिर के रूप में विराजमान किये गये हैं तथा रंग-बिरंगे देवभवनों में गृह चैत्यालय हैं, जिनमें किंन्हीं के एक और साइड में ओंर किंन्हीं में नीचे देव या देवी अपने-अपने भवन में बैठे हैं ओंर दूसरी ओंर या ऊपर गृह चैत्यालय के रूप में भगवान विराजमान है| विदेह क्षेत्रों में जगह कम होने पर भी वहाँ छोटे-छोटे समवसरणो में भी 4-4 भगवान दिख रहे हैँ | जैसा कि जैन ग्रंथों में कहा भी है कि धनिया के पत्ते बराबर मंदिर बनाकर सरसों बराबर प्रतिमा विराजमान करने वाले भव्यों को असीम पुण्य का संचय होता हें | इस पूर्व दिशा की रचना में 1-2 नहीं, पूरे 80 समवसरण हैं जो कि बडे सुंन्दर लगते हैं | इन्हें पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमतीं माताजी को भावनानुसार कुशल कारीगर ने अष्टधातु से बनाया हें|

महानुभावों ! यूँ तो यह पूरी रचना अष्टधातु की ही बनी हुई है, आप पूरी सोने की मत समझ लेना, किंन्तु भक्तों की उदात्त भावनानुसार इसमें पंचमेंरू पर्वत, 458 अकृत्रिम चैत्यालय एवं 170 समवसरणो में सोने का भी काम कराया गया हैं, शेष सभी जगह यथास्थान विभिन्न रंगीन कलाकृति, बाग- बगीचे, नदी -पर्वत आदि दर्शाए गये हैं | जिस पर्वत का जो वर्ण ग्रंथों में कहा हें उसे उसी रंग में दिखाने को प्रेरणा पूज्य माताजी की रही है | पूर्व दिशा के सभी भगवन्तो को श्रद्धा पूर्वक नमन करते हुए आगे चलें,तो दक्षिण के प्रदक्षिणा पथ में निर्मित प्लेटफार्म पर चढे इधर से पूरी रचना का दक्षिण भाग देखना है | इधर ढाई द्वीपों के पाँच भरतक्षेत्रों की रचना हें | अत: 5 तीर्थंकर भगवन्तो के सुन्दर समवसरण में चतुर्मुखी प्रतिमाओं के दर्शन करके. मनोवाञ्छित फल की प्राप्ति कीजिए | प्राय: सभी जगह द्वीपों के, पर्वतों के नाम भी लिखे हैं ऊँचे प्लेटफार्म से पूरी रचना कुछ ज्यादा ही सुन्दर लगती हें | इसे जो लोग ठीक से नहीं समझ पाते हैं वे भी रचना का सौंदर्य देखकर अनायास बोल पइते हैँ-

"अरे वाह ! ज्ञानमती माताजी ने तो धरती पर स्वर्ग ही बनाकर दिखा दिया है|" अर्थात् इस प्रकार कहकर और मन में प्रसन्न होकर अन्जान पर्यटक भी अज्ञानरूप से पुण्य का बंध कर लेते हैं। जैसे जबर्दस्ती भी औषधि खाने वाला प्राणी स्वस्थ हो जाता हँ, अरुचि से मिश्री खाने वाले का भी मुँह मीठा ही होता हैं, उसी प्रकार अन्जान लोगों के द्वारा भी धर्म, तीर्थ ओंर धर्मायतनों की वंदना करने से उत्तम-हितकर फल की प्राप्ति भी कर ली जाती हैं इसमें कोई सन्देह नहीँ हैँ । बन्धुवर ! आपके पीछे भी कुछ लोग जरूर प्रदक्षिणा करते हुए आ रहे हैं अत: आपको प्लेटफार्म से उत्तर क़र अब आगे चलना हें । मन में आल्हाद हैं और वचन से कोई न कोई स्तुति पढते हुए पश्चिम दिशा के प्लेटफार्म पर चढें । यहाँ से रचना का पश्चिम भाग पूरा देखना हें । सबेरे-सबेरे चूँकि पूर्व दिशा का सूर्य सामने शीशे से प्रवेश क़रता हैं, इसलिए सुबह 7 बजे से 1 बजे तक पश्चिम के प्लेटफार्म पर खड़े होकर पूरी रचना का जो स्वर्णिम निखार दिखता हैं वह वास्तव में शब्दों में कहा नहीँ जा सकता हैँ । इसी प्रकार 1 बजे बाद सूर्य चूँकि दक्षिण-पश्चिम की ओर जाने लगता हैं अत: पूर्व दिशा के प्लेटफार्म पर देखने वालों की भीइ जमा रहती हैं| मंदिरों के अतिरिक्त तेरहद्वीप रचना के अन्दर बहुत सारे हरे-हरे वृक्षो में कुछ वस्तुएं लटकती दिख रही हैं | इनके बारे में भी आपको जानना हें-

ढाई द्वीपों में 30 भोगभूमियाँ मानी गई हैं उन सभी जगहों पर 10-10 प्रकार के कल्पवृक्ष हैं जिनसे मुँहमांगी वस्तुएं प्राप्त होती हैं | इनमें देखो, किसी कल्पवृक्ष में माला-मुकुट लटक रहे हैं, किसी में वीणा-ढोलक हैं, किसी में घन्टे हैं, किसी में मकान हैं, और किसी में फल लटक रहे हैं | अब आप स्वयं सोचें कि जहाँ इतने सारे कल्पवृक्ष और समवसरण आदि हैं वहाँ कोई भी मन वाञ्छित फल प्राप्त कर लेवे तो कौन सी बडी बात हें | अरे ! इस तेरहद्वीप रचना में तो शुरू से ही बडा चमत्कार देखने-सुनने को मिल रहा हें | इसकी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होने के बाद 9 मई 2007 को कोरबा छत्तीसगढ़ से एक सज्जन ने आकर बताया कि मेरी दुकान पर जिस दिन तेरहद्वीप पंचकल्याणक महोत्सव का निमंत्रण कार्ड प्राप्त हुआ, उसी दिन इतनी अधिक आमदनी हुई, जितनी उससे पहले कभी नहीँ हुई थी इसीलिए मैं उस रचना के साक्षात् दर्शन करने हस्तिनापुर आया हूँ। ऐसे ही रोज न जाने कितने लोग अपने-अपने चमत्कारिक अनुभव सुनाते रहते हैं, तब पूज्य श्री ज्ञानमती माताजी कहतीं हैं कि-

"जहाँ 2100 जिनप्रतिमाएं विराजमान हैं उस रचना के दर्शन करने वालों को हमेशा सब ओर से इक्कीसा फल ही प्राप्त होगा, इसमें कोई सन्देह वाली बात नहीं है |"

तीनों प्लेटफार्म से अन्दर की सब तरफ की रचना देख-देखकर निश्चित रूप से बडी खुशी होती हें क्योकि सभी दिशाओ में विराजमान भगवन्तों के दर्शन होते हैं ओंर छोटे-छोटे जम्बू -शाल्मलि आदि वृक्षों की शाखाओं पर भी बने जिनमंदिर दिखाई देते हैं | इनमें पाँच भरतक्षेत्रों एवं ऐरावतक्षेत्रों में वर्तमानकालीन 5-5 तीर्थकर विराजमान हैँ | विदेह क्षेत्रों के सीमंधर-युगमंधर आदि विद्यमान बीस तीर्थकर भी यहाँ विराजमान किये गये हैं | ज्यादा सूक्ष्मता से इस रचना को जानने के लिए तो इसके परिचय की पुस्तक पढें त्रिलोकभास्कर, तिलोयपण्णत्ति, त्रिलोकसार आदि ग्रंथों का स्वाध्याय आपको करना पडेगा | किन्तु यहाँ संक्षेप में इतना अवश्य जानना है कि- 1 . इन तेरहद्वीपों के अंतर्गत ढाई द्वीप में पाँचमेरु पर्वत हैं | 2. प्रथम जम्बूद्वीप से लेकर तेहरवें रुचकवर द्वीप तक 458 अकृत्रिम शाश्वत जिनमंदिर हैं | 3. इन स्वर्णिम पाँचों मेरुपर्ततों के 16-16 जिनमंदिरों में एवं सभी स्वर्णिम जिनमंदिरों में स्वयंसिद्ध भगवन्तो की जिनप्रतिमाएं विराजमान हैं | 4. इन तेरहद्वीपों में हिमवान् आदि पर्वतों पर एव पद्म आदि सरोवरों में श्री-ही-धृति आदि देवियों के कमल भवनों में कुल 830 देव-देवी के भवन हैं | 5. जम्बुद्वीप के अतिरिक्त सभी द्वीपों के पर्वतों पर सभी देव-देवियों के भवनों में उन-उनके गृहचैत्यालयों में भगवान की प्रतिमाएं विराजमान हैं | 6. इस रचना के अन्दर जम्बूद्वीप के 1 भरतक्षेत्र, 1 ऐरावतक्षेत्र है | पूर्व धातकीखण्ड आँर पश्चिम धातकीखण्ड द्वीप में 1-1 भरतक्षेत्र और 1-1 ऐरावतक्षेत्र हैं | इसी प्रकार पूर्व पुष्करार्ध द्वीप एवं पश्चिम पुष्करार्ध द्वीप में 1-1 भरतक्षेत्र और 1-1 ऐरावतक्षेत्र हैं | ऐसे 5 भरतक्षेत्र एवं 5 ऐरावतक्षेत्र हैं | 7. इस पूरी रचना के अंदर ढाई द्वीपों में 160 विदेह क्षेत्र हैं | उनकी व्यवस्था इस प्रकार हें-जम्बूद्वीप में 32 विदेहक्षेत्र, पूर्व धातकीखण्ड द्वीप में 32 विदेहक्षेत्र,पश्चिम धातकीखण्ड द्वीप में 32 विदेहक्षेत्र, पूर्व पुष्करार्ध द्वीप में 32 विदेहक्षेत्र एवं पश्चिम पुष्करार्ध द्वीप में 32 विदेहक्षेत्र अत: ३२ × ५= १६० की संख्या हैं | 8. इन सभी 160 विदेह क्षेत्रो में शाश्वत कर्मभूमि की व्यवस्था पाई जाती हैँ | 5 भरतक्षेत्र एवं 5 ऐरावतक्षेत्रों की 10 कर्मभूमियाँ मिलाकर कुल 170 कर्मभूमियँ ढाई द्वीपों में हैं | 9. इन सभी 170 कर्मभूमियों में 170 तीर्थकर भगतन्तो के समवसरण तेरहद्वीप रचना में दर्शाए गए हैं जिनमें प्रत्येक में 4-4 जिनप्रविमाएं विराजमान हैं | 10. इसी प्रकार ढाई द्वीपों के 5 भरत, 5 ऐरावत क्षेत्रों के अन्य तीर्थंकर तथा विदेहों के विद्यमान 20 तीर्थकर भगवान भी यहां विराजमान हैं तथा अनेक तीर्थंकर एवं सिद्ध भगवन्तो की प्रतिमाएं विराजमान हैं | 11. इन सब दो हजार से अधिक भगवन्तो के दर्शन करके महान पुण्य का संचय करें | 12. ढाई द्वीप की 30 भोगभ्रूमियों में यथास्थान कल्पवृक्ष हैं जो मुँह मांगा फल देते हैं | 13. यहाँ पर सरस्वती, लक्ष्मी, पद्मावती एवं अनावृतयक्ष आदि की मूर्तियां भी हैं , वे भी सभी भक्तों को इच्छित फल देने वाले हैं | तेरहद्वीप में विराजमान ये सभी भगवान आप सबको मनवाच्छित फल देने वाले हैं | सर्व अमंगल और विघ्न बाधाओं को दूर करने वाले हैं |आप इनके दर्शन करके अपने इच्छित फलों को प्राप्त करें |





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