जैन धर्म का मूल मंत्र- णमो अरिहंताणं  । णमो सिद्धाणं । णमो आइरियाणं । णमो उवज्झायाणं । णमो लोए सव्व साहूणं|

प्रश्नोत्तरी

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हमारे मार्गदर्श्क

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श्री ज्ञानमती माताजी

जैनशासन के वर्तमान व्योम पर छिटके नक्षत्रों में दैदीप्यमान सूर्य की भाँति अपनी प्रकाश-रश्मियों को प्रकीर्णित कर रहीं पूज्यगणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर उठी लेखनी की अपूर्णता यद्यपि अवश्यंभावी है, 

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श्री चंदनामती माताजी

प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी पूर्ण समर्पित प्रमुख शिष्या के रूप में पूज्य माताजी के संघ का एवं विविध धार्मिक, सामाजिक गतिविधियों का अत्यंत कुशलता के साथ समायोजन करते हुए सदैव सम्यकज्ञान की प्राप्ति, 

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श्री रविंदर कीर्ति स्वामीजी

जैन जगत की सर्वोच्च साध्वी गणनी प्रमुख ज्ञानमती माता के प्रमुख शिष्य पीठाधीश्वर स्वास्तिक रविंद्र कीर्ति स्वामी जी, स्वामी जी ने अपना पूरा जीवन ज्ञानमती माता की सेवा में लगा दिया। स्वामी जी ने अपना पूरा जीवन ज्ञानमती माता की सेवा में लगा दिया।

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हस्तिनापुर तीर्थ

ऐतिहासिक तीर्थक्षेत्र हस्तिनापुर अयोध्या के समान ही अत्यन्त प्राचीन एवं पवित्र माना जाता है। जिस प्रकार जैन पुराणों के अनुसार अयोध्या नगरी की रचना देवों ने की थी उसी प्रकार युग के प्रारंभ में हस्तिनापुर की रचना भी देवों द्वारा की गयी थी। अयोध्या में वर्तमान के पाँच तीर्थंकरों ने जन्म लिया तो हस्तिनापुर को शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरहनाथ इन तीन तीर्थंकरों को जन्म देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इतना ही नहीं, इन तीनों जिनवरों के चार-चार कल्याणक (गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान) हस्तिनापुर में इन्द्रों ने मनाए हैं ऐसा वर्णन जैन ग्रंथों में है।

जम्बूद्वीप दर्शन

सन् 1965 में श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चातुर्मास के मध्य जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी परमपूज्य 105 गणिनीप्रमुख आर्थिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी को विंध्यगिरि पर्वत पर भगवान बाहुबली के चरण सानिध्य में पिण्डस्थ ध्यान करते-करते मध्यलोक की सम्पूर्ण रचना, तेरहद्वीप का अनोखा दृश्य ध्यान की तरंगों में दिखाई दिया। पुनः दो हजार वर्ष पूर्व के लिखित तिलोयपण्णत्ति, त्रिलोकसार आदि ग्रंथों में उसका ज्यों का त्यों स्वरूप देखकर वह रचना कहीं धरती पर साकार करने की तीव्र भावना पूज्य माताजी के हृदय में आई और उसका संयोग बना हस्तिनापुर में।

हर एक जीवित जीवधारी के प्रति दयाभाव रखो, क्योंकि नफरत और घृणा करने से विनाश होता है।

भगवान महावीर स्वामीजी

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