जम्बूद्वीप परिसर का आध्यात्मिक सौंदर्य 

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स्वर्णिम कलश से युक्त 

सुमेरु पर्वत की चोटी

             उत्तर भारत के गौरव का प्रतीक माना जाने वाला जंबूद्वीप अपने आप में स्वयं एक परिपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र है, जिसके दर्शन के द्वारा देश-विदेश से आने वाले समस्त जाति के पर्यटक अद्वितीय शांति और प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। 78 अकृतिम जिन मंदिरों, 122 देवभवनों के जिनालयों एवं 6 समवसरण मंदिरों के धार्मिक वातावरण से परिपूर्ण जंबूद्वीप के चारों ओर निर्मित गोलाकार लवण समुद्र में भरे जल के अंदर यात्री नौका विहार का आनंद लेते हैं तथा साईं कालीन बिजली-फौव्वारों का अलौकिक दृश्य देखने के लिए तो सभी विशेष रूप से एकत्रित होते हैं। 

            प्राकृतिक एवं अध्यात्मिक सौंदर्य की प्रतिमूर्ति जंबूद्वीप रचना मात्र 250 फुट डायमीटर में बनी है किंतु वर्तमान में दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान द्वारा संचालित लगभग 35 एकड़ भूमि के परिसर में धार्मिक, शैक्षणिक, साहित्य आदि चहूँमुखी गतिविधियां निरंतर चलती रहती हैं और मेरठ जनपद ही क्या पूरे देश में यह संस्था तथा इसका संपूर्ण कार्य जंबूद्वीप के संक्षिप्त नाम से ही विख्यात है। 

            इस जंबूद्वीप परिसर में कमल मंदिर, तीन मूर्ति मंदिर, शांतिनाथ मंदिर, वासुपूज्य मंदिर, ओम मंदिर, सहस्त्र कूट जिनालय, विद्यमान 20 तीर्थंकर मंदिर, आदिनाथ मंदिर, ऋषभदेव कीर्ति स्तंभ, ध्यान मंदिर, अष्टापद मंदिर एवं 13 द्वीप जिनालय आदि हैं | इनमें से ध्यान मंदिर विशेष आकर्षक नूतन शैली में निर्मित है तथा प्रत्येक आगंतुक को आध्यात्मिकता एवं ध्यान साधना का जीवंत संदेश प्रदान करता है | यहाँ 'णमोकार महामंत्र  बैंक' के नाम से सन 1995 में स्थापित बैंक में भक्तों द्वारा लिखे गए करोड़ों मंत्रों की कॉपियों का संग्रह है और वह लेखन क्रम निरंतर जारी है इसमें 1 वर्ष के अंदर सवा लाख,  50 हजार,  25 हजार मंत्र लिखकर जमा करने वालों को क्रमश; हीरक, स्वर्ण एवं रजत पदक से शरद पूर्णिमा के दिन सम्मानित किया जाता है। 

 

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भगवान आदिनाथ जिनालय 

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ऋषभदेव कीर्तिस्तंभ

 

 

 

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नौका विहार से भक्तजन करते हैं जम्बूद्वीप की प्रदक्षिणा 

 

 

 

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ऐरावत हाथी जिस पर बैठकर भक्तजन जम्बूद्वीप की परिक्रमा करते हैं

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ध्यान मंदिर

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ध्यान मंदिर में विराजमान

24 तीर्थंकरों से संयुक्त 

'ह्रीं' बीजाक्षर की प्रतिमा

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विद्यमान बीस तीर्थंकर मंदिर में विराजमान प्रतिमाएँ

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ॐ मंदिर में विराजमान पंचपरमेष्ठी भगवंतों 

की प्रतिमाओं से संयुक्त ग्रेनाइट का विशाल ॐ

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1008 जिनप्रतिमाओं से 

संयुक्त सहस्रकूट मंदिर

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24 तीर्थंकर जिनमंदिर की मनोहारी वेदी

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त्रिकाल चौबीसी तीर्थंकर प्रतिमाओं से

संयुक्त अष्टापद जिनमंदिर

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अष्टापद जिनमंदिर में 72 जिनालयों से 

युक्त पर्वत का दृश्य

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तीनमूर्ती मंदिर में विराजमान 

भगवान आदिनाथ, भरत एवं बाहुबली की प्रतिमाएं

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उत्तर भारत में प्रथम बार निर्मित नवग्रहशान्ति जिनमंदिर,

जहां 9 कमालासनों पर विराजमान हाँ नवग्रहों के अरिष्ट

को दूर करने वाले नव तीर्थंकरों की अष्टधातु से बनी प्रतिमाएं

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हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस द्वारा भगवान

आदिनाथ को इक्षुरस का प्रथम आहार दान

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युग की आदि में भगवान ऋषभदेव अपनी

सुपुत्रियों ब्राह्मी और सुन्दरी को अंक लिपि

और अक्षर लिपि का ज्ञान प्रदान करते हुए

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झाँकियाँ

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झाँकियाँ

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जलपरियाँ

मनोरंजन के साधन

       आबालवृद्ध सभी की रुचि का ध्यान रखते हुए संस्थान द्वारा इस परिसर के अन्दर हस्तिनापुर के प्राचीन इतिहास से संबंधित झाँकियाँ, चित्रप्रदर्शनी, हंसी के फव्वारे, जम्बूद्वीप रेल, झूले तथा मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध कराये गये हैं।

        हरे भरे लॉन, फुलवारी एवं सुन्दर पार्क में बैठकर जहाँ लोग प्राकृतिक सौंदर्य का रसपान करते हैं, बच्चे खेलते हुए स्वयं पुष्पवाटिका का रूप दर्शाते हैं, वहीं होली, दीवाली, कार्तिक पूर्णिमा, अक्षयतृतीया, शरदपूर्णिमा आदि विशेष मेलों के अवसर पर दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदाय के संगठन का परिचय भी प्राप्त होता है। 'जम्बूद्वीप महामहोत्सव' के नाम से प्रति पाँच वर्षों में यहाँ विशेष उत्सव सम्पन्न होता है।

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रेल

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कोलम्बस एवं ट्रेन

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झूले

जम्बूद्वीप क्या है ?

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विदेह क्षेत्र का दृश्य

     जैन भूगोल का ज्ञान कराते वाली जम्बूद्वीप रखना हमारी सृष्टि की प्रतिकृति है। इसके बीच में निर्मित सुमेरुपर्वत इस रचना का मध्य केन्द्र बिंदु माना जाता है और इस सुमेरुपर्वत के कारण जम्बूद्वीप रचना के अंदर पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण चार प्रकार से भिन्न-भिन्न रचना के रूपों का ज्ञान

होता है जिसमें पूर्व और पश्चिम की रचना पूर्व विदेह क्षेत्र और पश्चिम विदेह क्षेत्र के नाम से जानी जाती है तथा दक्षिण दिशा में भरतक्षेत्र की प्रमुखता के साथ अन्य विजयार्ध, हिमवान् आदि पर्वत, गंगासिंधु आदि नदियाँ हैमवत आदि क्षेत्र कल्पवृक्षों से सहित भोगभूमि के दृश्य, चैत्यालय, देवभवन, कुण्ड उपवन आदि दिखाये गये हैं एवं इसी प्रकार उत्तर दिशा में ऐराक्त क्षेत्र की प्रमुखता के साथ ऐसी ही पृथक् नाम वाली सभी रचनाएं बनी है।

      सुमेरुपर्वत के बिल्कुल नजदीक धरती पर उत्तर में धातु का जम्बूवृक्ष और दक्षिण में शाल्मलिवृक्ष बनाकर उनमें भी मंदिर दिखाये गये हैं। इन सभी रचनाओं का वर्णन यदि पहले ठीक प्रकार से तिलोयपण्णति, त्रिलोकसार, तत्त्वार्थसूत्र आदि ग्रंथों में पढ़ लिया जावे पुनः जम्बूद्वीप के एक-एक हिस्से को देखें तो वास्तविक ज्ञान शीघ्र ही हो जाता है।

           शास्त्रों के अनुसार दिये गये पूर्वाचार्यों के निर्णयानुसार वर्तमान का सम्पूर्ण विश्व (छहों महाद्वीप) दक्षिणभाग के भरतक्षेत्र में ही प्राप्य है, शेष विशाल सृष्टि तक आज हम पहुँच नहीं सकते हैं।

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जम्बू वृक्ष

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प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर प्रवचन हॉल : 

1000 दर्शकों की बैठक क्षमता से युक्त विशाल ऑडिटोरियम

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उत्तर भारत में प्रथम बार जम्बूद्वीप हस्तिनापुर में पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा पीठाधीश पद की स्थापना की गई। जिसके प्रथम पीठाधीश क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी महाराज द्वारा जम्बूद्वीप का अनुशासित संचालन किया जा रहा है। इस पीठ की स्थापना 2 अगस्त 1987 को हुई थी। इसीलिए जम्बूदीप स्थल पर पीठाधीश भवन का निर्माण हुआ है।

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पुस्तकालय भवन


जम्बूद्वीप पुस्तकालय एवं 

गणिनी ज्ञानमती शोधपीठ

शिक्षाप्रेमियों के लिए यहाँ लगभग 15 हजार पुस्तकों के भण्डारण का "जम्बूद्वीप पुस्तकालय' है तथा गणिनी ज्ञानमती शोध पीठ' के द्वारा विभिन्न जैन साहित्य पर शोधकार्य चलता है। हजारों मुद्रित ग्रंथों के साथ-साथ उक्त पुस्तकालय में अनेक प्राचीन प्राकृत एवं संस्कृत की पांडुलिपियाँ भी धरोहर के रूप में विद्यमान हैं।

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जम्बूद्वीप पुस्तकालय