जम्बूद्वीप निर्माण का प्रथम चरण 
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              जुलाई सन 1974 में रखी गई नींव के आधार पर जंबूद्वीप के बीचो बीच में सर्वप्रथम आगमवर्णित सुमेरु पर्वत (101 फुट ऊंचा) का निर्माण अप्रैल सन 1979 में पूर्ण हुआ | सोलह जिन मंदिरों से समन्वित इस सुमेरु पर्वत में अंदर से निर्मित 136 सीढ़ियों से चढ़कर श्रद्धालु भक्त समस्त भगवंतों के दर्शन करके जब सबसे ऊपर पांडुक शिला के निकट पहुंचते हैं तो नीचे जंबूद्वीप रचना के सभी नदी, पर्वत, मंदिर, उपवन आदि दृश्यों के साथ-साथ हस्तिनापुर के आसपास के सुदूरवर्ती ग्रामों का भी प्राकृतिक सौंदर्य देखकर फूले नहीं समाते हैं |

            जैन एवं वैदिक ग्रंथों के अनुसार यह सुमेरु पर्वत तीनों लोकों एवं तीनों कालों में सबसे पवित्र तथा ऊंचा पर्वत माना जाता है, इसी पर्वत पर समस्त जैन तीर्थंकरों के जन्म अभिषेक का वर्णन जैन शास्त्रों में मिलता है | 1 लाख 40 योजन अर्थात 40 करोड़ मील (60 करोड़ किमी.) की ऊंचाई वाले उस अकृतिम सुमेरु पर्वत को विश्व में प्रथम बार हस्तिनापुर में 101 फुट ऊंची प्रतिकृति के रूप में निर्मित किया गया है |

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आर्यिका रत्नमती कीर्ति स्तंभ 

   (पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की गृहस्थावस्था की मां मोहिनी देवी,  जिन्होंने सन 1971 में आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर 13 वर्ष तक कठोर तपस्या की और 15 जनवरी 1985 को सल्लेखनाविधि पूर्वक समाधि मरण प्राप्त किया|)

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जम्बूद्वीप बनने पर तो मानो सचमुच ही स्वर्ग धरती पर उतर आया था !

                सन १९८० में साहू श्री अशोक कुमार जैन ने अपने परिवार सहित पधारकर जम्बूद्वीप रचना का शिलान्यास किया और जैन भूगोल को दर्शाने वाली उस रचना की एक एक कृति का निर्माण होते-होते ५ वर्ष पश्चात सम्पूर्ण रचना बनकर तैयार हो गयी | इस मध्य ४ जून १९८२ को पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा संस्थान ने राजधानी दिल्ली के लालकिला मैदान से 'जम्बूद्वीप ज्ञानज्योति' नामक रथ का प्रवर्तन कराया | उस रथ ने १०४५ दिनों तक पूरे देश में भ्रमण करके जैन भूगोल एवं अहिंसा, सदाचार, व्यसनमुक्ति का प्रचार किया पुनः २८ अप्रैल सन १९८५ को जब हस्तिनापुर में ज्ञानज्योति रथ पंहुंचा तब श्री पी. वी. नरसिंहराव (तत्कालीन रक्षा मंत्री-भारत सरकार) ने वहां उस 'अखण्ड ज्ञानज्योति' को स्थाई रूप से स्थापित किया|

 

 
 
 
           उस अवसर पर संस्थान द्वारा २८ अप्रैल से २ मई १९८५ तक 'जम्बूद्वीप जिनाबिम्ब प्रतिष्ठापना महोत्सव' में २०५ भगवंतों की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार के सहयोग से धरती से लेकर सुमेरु पर्वत की ऊंचाई तक विशाल मचान का आकर्षक निर्माण हुआ, जिसमें पूरे देश से (ज्ञानज्योति में बोली लेकर इंद्रा-इन्द्रानी का पद प्राप्त करने वाले एवं अन्य प्रकार से सहयोग प्रदान करने वाले) लाखों नर-नारियों ने हस्तिनापुर पधारकर सुमेरु पर्वत पर होने वाले महामस्तकाभिषेक में भाग लिया | उस समय हस्तिनापुर के चप्पे-चप्पे पर जन सैलाब इस प्रकार उमड़ा जैसे मानो फिर से एक बार धरती पर स्वर्ग के इंद्र-देवगण ही उतर आये थे |
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          उस महोत्सव में धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ 'जैन गणित एवं त्रिलोक विज्ञान पर एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार भी संस्थान ने मेरठ विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया उत्तर प्रदेश की ओर से तत्कालीन मुख्यमंत्री से श्री नारायण दत्त तिवारी ने अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए आगंतुक समस्त यात्रियों की सुविधा हेतु सड़क निर्माण बिजली-पानी परिवहन आदि अनेक प्रकार का सरकारी सहयोग प्रदान किया उसके पश्चात से आज तक उत्तर प्रदेश सरकार का सदैव यथासंभव सहयोग प्राप्त होता रहता है तथा अनेक प्रादेशिक एवं केंद्रीय राजनेता समय-समय पर जम्बूद्वीप स्थल पर पधार कर गौरव का अनुभव करते हैं