भगवान ऋषभदेव आदि 5 तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या का विकास

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विकास का संक्षिप्त इतिहास

         22 अक्टूबर सन 1992 धनतेरस को प्रातः कालीन ध्यान में भगवान ऋषभदेव के दर्शन एवं उनके महामस्तकाभिषेक की अंतर प्रेरणा से पूज्य माता जी के मन में अयोध्या तीर्थ की ओर विहार करने की भावना जागृत हुई | उन्हें 11 फरवरी 1993 को हस्तिनापुर से विहार करके जून 1993 में अयोध्या पहुंची और वहां बड़ी मूर्ति जिनालय के आजू-बाजू में कमलासन पर त्रिकाल चौबीसी से समन्वित जिनमंदिर व सुंदर रचना से समन्वित भव्य समवसरण जिनमंदिर का निर्माण किया गया | तीर्थ पर भारत गौरव आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज की कृपा प्रसाद से सन 1965 में विराजमान की गई 31 फुट उत्तुंग भगवान ऋषभदेव की खडगासन प्रतिमा से समन्वित प्राचीन जिनमंदिर भी है |

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            पूज्य माता जी के अयोध्या प्रवास के अंतर्गत यात्री सुविधा हेतु भव्य धर्मशालाएं, भोजनशाला, व्यवस्थित कार्यालय आदि का भी निर्माण किया गया है | पुन: विशेष रूप से क्रमशः सन 1994 एवं 2005 में यहां राष्ट्रीय स्तर पर भगवान ऋषभदेव का महामस्तकाभिषेक संपन्न हुआ | पश्चात फरवरी सन 2011 में यहां भगवान ऋषभदेव की वास्तविक जन्मभूमि प्रथम टॉक पर विशाल जिनमंदिर का निर्माण कर के 5 फुट उत्तुंग  प्रतिमा विराजमान की गई है | 


तीर्थ का पता एवं संपर्क - श्री दिगंबर जैन अयोध्या तीर्थ क्षेत्र कमेटी, बड़ी मूर्ति, पो.- अयोध्या (फैजाबाद) उ. प्र., फोन-05278-232308