शांतिनाथ समवशरण मंदिर

JAMBUDWEEP से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

शांतिनाथ समवशरण मंदिर

IMG-20191115-WA0023.jpg


दिगम्बर जैन आगम ग्रन्थों के अनुसार पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से निर्मित इस ७२ फुट ऊँचे समवसरण जिनमंदिर में भगवान शान्तिनाथ के समवसरण की रचना अद्भुत सौन्दर्य से परिपूर्ण है। दिगम्बर जैन आगम ग्रन्थों के आधार से निर्मित इस रचना के दर्शन अवश्य दर्शन करें तथा अपने मंदिरों में भी ऐसे ही शास्त्रीय समवसरण बनवाएँ । स्टेप वाली रचना शास्त्र की दृष्टि से सही नहीं है ।


भगवान को केवलज्ञान प्रगट होते ही इंद्र की आज्ञा से कुबेर अर्धनिमिष में समवसरण की रचना कर देता है | उस समय भगवान तीनों लोकों को और उनकी भूत,भावी,वर्तमान समस्त पर्यायों को युगपत एक समय में जान लेते हैं | भगवान शांतिनाथ का समवसरण पृथ्वी से 5000 धनुष (20000 हाथ) ऊपर आकाश में अधर है | पृथ्वी से एक हाथ ऊपर से एक-एक हाथ ऊँची बीस हजार सीढ़ियाँ है इनसे चढ़कर मनुष्य और तिर्यंच आदि भव्य जीव-बाल, वृद्ध, अंधे, लूले, लंगड़े,रोगी आदि अन्तर्मुहूर्त (48मिनट) में ऊपर पहुँच जाते है | भगवान शांतिनाथ का समवसरण साढ़े 4 योजन (36 मील) का गोल है|

इसमें चार परकोटे और पाँच वेदियाँ हैं । इनकी आठ भूमियाँ हैं । चारों दिशाओं में बहुत ही विस्तृत वीथी बड़ी-बड़ी गलियाँ है|

इस समवसरण में क्रम से पहले धूलिसाल परकोटा, चैत्यप्रासाद भूमि, वेदी, खातिकाभूमि, वेदी, लताभूमि, परकोटा, उपवनभूमि, वेदी, ध्वजभूमि, परकोटा, कल्पभ्रूमि, वेदी, भवनभूमि, परकोटा, श्रीमण्डपभ्रूमि और वेदी हैं। आगे 16 सीढ़ी ऊपर चढ़कर पहली कटनी, 8 सीढ़ी चढ़कर दूसरी कटनी, पुन: 8 सीढ़ी चढ़कर तीसरी कटनी हैं। इसी पर भगवान विराजमान हैं।

प्रत्येक परकोटे और वेदियो में चारों दिशाओं में एक-एक गोपुर द्वार हैं । जिनमें से पूर्वदिशा में "विजय", दक्षिण में ”वैजयंत" पश्चिम में "जयंत" और उत्तर में "अपराजित" ऐसे नाम हैं । इन चारो के उभय पार्श्व में दो-दो नाट्यशालाएं हैं, जिनमें देवांगनाएं भगवान को भक्ति में विभोर हो नृत्य -गान करती रहती हैं! वहाँ द्वारों के दोनो और नवनिधि, मंगलघट और धूपघट आदि स्थित हैं। प्रत्येक परकोटे के द्वारों पर देवगण हाथ में दण्ड, मुद्गर आदि लेकर रक्षक बनकर खड़े हुए हैं|

समवसरण में प्रवेश करते ही चारों गली में दिव्य रत्नमय मानस्तंभ हैंजो कि भगवान से बारहगुने ऊँचे हैं । भगवान शांतिनाथ के शरीर की ऊँचाई 160 हाथ है अत: ये बारहगुणे 160×12=1920 हाथ ऊँचे हैं। बीस योजन तक प्रकाश फैलाते हैं। इनके दर्शन से मानी का मान गलित हो जाता है और वह भव्यात्मा सम्यग्दृष्टि बनकर अनंत संसार को सीमित कर लेता हैं।

केवली भगवान के प्रभाव से चारों तरफ चार सौ कोस तक सुभिक्षता,हिंसा और उपसर्गादि का अभाव, सभी ज़न्मजात शत्रु-सिंह, हिरण आदि का आपस में मैत्री भाव, छहों ऋतुओं के फल-फूलों का एक साथ आ जाना आदि अतिशय हो जाते हैं।

भगवान के श्रीविहार में आकाश में अधर, उनके चरण के नीचे देवगण स्वर्णमय सुगंधित दिव्य कमलों को रचते जाते हैं और अहिंसा धर्म के दिग्विजय को सूचित करता हुआ ’धर्मचक्र' भगवान के आगे-आगे चलता है एवं सरस्वती-लक्ष्मी देवी आजू-बाजू में चलती हैं। आकाशगामी ऋद्धिधारी साथ में चलते हैं असंख्य देव-देवियाँ, इंद्रादिगण पीछे -पीछे चलते हैं एवं साधारण मुनि, आर्यिकाएं, मनुष्य, पशु आदि नीचे-नीचे चलते हैं। जहाँ भगवान रुक जाते हैं वहाँ पुन: कुबेर समवसरण की रचना क़र देता है।

समवसरण में आठ भूमि और तीन कटनी

1. पहली "चैत्यप्रासादभूमि" हैं, इसमें एक -एक जिनमंदिर के अंतराल में पांच-पांच प्रासाद हैं ।

2. दूसरी ”खातिकाभूमि" हैं, इसके स्वच्छ जल में हंस आदि कलरव कर रहे हैं और कमल आदि पुष्प खिले हैं ।

3. तीसरी "लताभूमि" हैं, इसमें छहों ऋतुओं के पुष्प खिले हुए हैं ।

4. चौथी "उपवनभूमि"हैं, इसमें पूर्व आदि दिशा में क़म से अशोक, सप्तच्छद, चंपक और आम्र के वन हँ । प्रत्येक वन में एक-एक चैत्यवृक्ष हैं जिनमें 4-4 जिनप्रतिमाएं विराजमान हैं । प्रत्येक प्रतिमाओं के सामने एक-एक मानस्तंभ हैं ।

5. पांचवी ”ध्वजाभ्रूमि" हैं, इसमें सिंह, गज, वृषभ, गरूड़, मयूर, चन्द्र, सूर्य, हंस, पद्म और चक्र इन दस चिन्होंं से सहित महाध्वजाएं और उनके आश्रित लघुध्वजाएं 108-108 हैं। सब मिलाकर 4,70,880 हैं।

6. छठी "कल्पभूमि” हैं, इसमे भूषणांग आदि दस प्रकार के कल्पवृक्ष हैँ | चारों दिशा मेँ क्रम से नमेरू, मंदार, संतामक़ और पारिजात ऐसे एक-एक सिद्धार्थवृक्ष हैं | इनमें चार चार सिद्धप्रतिमाएं विराजमान हैं |

7. सातवीं "भवनभूमि" मेँ भवन बने हुए हैं | इस भूमि के पार्श्व भागों में अर्हंत और सिद्धप्रतिमाओं से सहित नौ-नौ स्तूप हैं।

8. आठवीं "श्रीमण्डपभूमि" है , इसमें 16 दीवालों के बीच में 12 कोठे हैं जिनमें-

1. गणधरादि मुनि,

2. कल्पवासिनी देवी,

3. आर्यिका और श्राविका,

4. ज्योतिषी देवी,

5. व्यंतर देवी,

6. भवनवासिनी देवी,

7. भवनवासी देव,

8. व्यंतर देव,

9. ज्योतिष देव,

10. कल्पवासी देव,

11. चक्रवर्ती आदि मनुष्य और

12. सिंहादि तिर्यंच, ऐसे बारहगण के असंख्यातों भव्यजीव बैठकर धर्मोपदेश सुनते हैं| वहां पर रोग, शोक, ज्ञन्म, मरण, उपद्रव आदि बाधाएं नहीँ हैं।

पुन: प्रथम कटनी पर आठ महाध्वजाएं हैं, द्वितीय कटनी पर आठ मंगलद्रव्य आदि हैं। तृतीय कटनी पर गंधकुटी में सिंहासन पर लाल कमल की कर्णिका पर भगवान शांतिनाथ चार अंगुल अधर विराजमान हैं । इनका मुख एक तरफ होते हुए भी चारो तरफ दिखने से ये चतुर्मुखी ब्रह्मा कहलाते हैं । भगवान के पास अशोकवृक्ष, तीन छत्र, सिंहासन, भामंडल, चौंसठ चंवर, सुरपुष्पवृष्टि, दुंदुभि बाजे और हाथ जोडे सभासद ये आठ महाप्रातिहार्य हैं। वहीँ पर गरूड़ यक्ष और महामानसी यक्षी विद्यमान हँ । इन शांतिनाथ भगवान को मेरा अनंतबार नमस्कार हो।